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जहाद
कुरान व इस्लामी खूंख्वारी ।
लेखक आर्य पथिक स्वर्गवासी महात्मा पंडित लेखराम
अनुवादक
पं० रघुनाथ प्रसाद मिश्र
भूमिका
आर्य मुसाफिर महामान्य पण्डित लेखराम की रचना मजहबी दुनियां में निहायत ऊंचा पद रखती है । इस विद्या और बुद्धि के ज़माने में जब कि पुरानी तुहमतों का परित्याग होता चला जाता है । जब कि सच्चाई के सिद्धान्त ने तलवार और जब को सभ्य संसार से बिल्कुल भटका दिया है। एक ऐसे अन्वेषी की रचना जिसने मुस्तनद किताबों के बिला हवाले के अपनो तरफ़ से एक हर्फ भी न लिखा हो वास्तव में सच के खोजियों के लिये वह हुक्म रखती है । जो अफरीकी सहरा के लोगों के लिये ठंडा पानी ! मुहम्मदी मुसलमानों का मसला जहाद भी पुराने तुहमात में से एक है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह मसला दीगर तुहमातकी निस्बत जियादहतर खतरनाक और सच्चे दीन को नए करनेवाला और मुस्लिम ईमान को बरबाद करनेवाला है । आनन्द का स्थल है कि विद्या विकाश के सामने जहालत ( मूर्खता ) की अन्धि घाटी ठहर न सकी और जिन हज़रत के पूर्वजों ने सच्चे दीन से फिर जाने के कारण अपने मज़हब के फैलाने के लिये दुनियावी तलवार से काम लिया था उन्हें भी जवान हाल से इक़रार करना पड़ा कि जत्र का धर्म से कोई लगाव नहीं है। मगर सवाल यह पैदा होता है कि जब पैग़म्बर अरब की उम्मत खुद इस मसले को गलती की कायल है तो मुर्दों के उखेड़ने से अब क्या हासिल, निश्संदेह अगर हमारे मुहम्मदी भाई साफ़ तौर पर अपने बुजुगों की गलतियों के कायल होजाते तो हमको लिखने की आवश्यक्ता न थी ।
लेकिन अफ़सोस कि हमारे शिक्षित मुसलमानोंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस्लाम कभी भी तलवार के
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- भूमिका
जोर से नहीं फैलाया गया । और यह भी दावा किया कि उनकी पाक किताब में इस किस्म का कोई हुक्म मौजूद नहीं है। यही वजह थी कि पण्डित लेखराम आर्य मुसाफिर ने क़ुरान हदीस और तारीखों के मुस्तनद हवालों से साबित कर दिखाया कि जहाद मुहम्मदी तालीम का एक बड़ा जुज़ है । इस खोज से स्वर्गवासा पं० लेखराम का यह अभिप्राय न था कि किसी का दिल दुःखे । बल्कि मतलब यह था कि मुहम्मदी तालीम को खतर नाक स्प्रिंट से आगाह होकर हमारे सैकड़ों वर्षों से बिछुड़े भाई फिर अपने प्राचीन वैदिक धर्म की शरण आवें ।
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मालावार मुल्तान, कोहाटकी घटनायें पुकारकर कहरही हैं कि जबतक हमारे अनपढ़ मुहम्मदी भाई सच्चे दोनसे बेखबर रहेंगे तब तक वाकई शान्ति का राज्य दुनियां में कायम नही होसक्ता, यही कारण है कि हमने संसार को इस्लामी अत्याचारों से जागृति करने व अन्य धर्मियों का आत्म रक्षण पर तय्यार रखने के लिये जिससे यह अत्याचारी आन्धी शान्ति होसके यह पुस्तक प्रकाशित की है । वास्तव में दुनिया में ईसाइयों और हिन्दुओं के लिये मुसलमानी मज़हब निहायत खतरनाक है। उससे सदैव सचेत रहना चाहिये जब तक ईश्वर की कृपा से इन लोगों के हृदय से ऐसे अत्याचारी भाव उठ न जावे यह तभी होसक्ता है जब सभ्य जगत इनको शिक्ष. और विद्या देकर इनके अत्याचारों का अन्त करदेवें जिससे मानुषी जगत में खून्खराबो के बजाय भातृभाव फैले और संसार को शान्ति उपलब्धि होसके यही हमारी कामना है।
एक जाति सेवक
रघुनाथप्रसाद मिश्र
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जहाद इस्लामी खूंख्वारी ॥
इन दिनों जब विद्या और बुद्धि की बढ़ती और सभ्यता का प्रसार स्वतन्त्रता पूर्वक होने लगा -जहाद को सम्पूर्ण शिक्षित पुरुष आश्चर्य की दृष्टि से देखने और उसके दावों पर विरोध करने लगे । इस पर बाजे नेचरी विचार के मुसलमान झूठ से मुँह फेरकर सच की ओर ध्यान देने के बदले उलटे अनुचित और व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं कि इस्लाम ने जहाद नहीं किया । कभी जातियां वलात् मुसलमान नहीं की गई। कभी कोई मन्दिर मुसलमानों ने नहीं तोड़ा । कभी किसी मन्दिर में गाय वध नहीं की गई। कभी गैर मज़हब की स्त्रियां बालकों को वलात् से और मज़हब से मुसलमान नहीं बनाया । और विना व्याह के उनके साथ | लौंडी और गुलाम समझ कर बदकारी के दोषी नहीं हुए । हमने विरोधियों के सामयिक पत्रों मेंजो नीचे लिखे हैं इस एक ही मज़मून को अत्यन्त ध्यान पूर्वक पठन किया और उनकी दलीलों को भी सच्चाई से
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मोलवी नूरुलद्दीन साहब ने किताब मुकद्दमतुल खिताब में और मौलवी गुलाबनवी ने मसअला जहाद में और मौलवी गुलाम हुसैन ने रिसाले जहाद में और सैय्यद अहमदखां ने तहजीब और तफसीर में और खलीफा साहब ने अपने शैजाज में जहाद के छिपाने की बहुत ही कोशिश की है ।
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देखा सबसे अधिक ज़ोर सैय्यद साहब ने लगाया है । वाकियों ने आम तौर पर उनके मजमून को नकल करके कहीं कहीं न्यूनाधिक किया है। यह शताब्दी क्या मुबारिक है कि खुद मुसलमान भी जहाद करने से इन्कार करने लगे लेकिन शोक है तो यह है कि वह कुरान से कोशिश करते हैं क़रान के चेहरे से सिर्फ यही एक जहादी दाग दूर करने की कोशिश नहीं करते बल्कि फ़िरिश्तों का इन्कार चमत्कारों का इन्कार, आस्मानों का इन्कार. वैकुण्ठ नरक का इन्कार, जिन्नों का इन्कार ईसा के बे बाप पैदा होने से इन्कार एक आदमी से कुल आदमियों के पैदा होने से इन्कार सारांश यह कि कुरान से तमाम गंवारपने की बातै निकाल कर पक्का इरादा कर रहे हैं कि उसको भारतीय सभ्यता बनावे-किन्तु शोक! क्योंकि: “कोशिशे वेफ़ायदस्त वस्मा वर अवरुये कोर" (अर्थ:-अन्धे के भौंह पर खिज़ाब लगाना व्यर्थ है ) । करान से ये बातें दूर होनी इस तरह हैं कि “क़ुरान क़ुरान नहीं रहता। और किसी मुसलमान की यह ताकत भी नहीं कि मक्क के अन्दर या मदीने की जियारत । ( तीर्थयात्रा ) के अन्दर खड़े होकर किसी एक बात को मुँह से निकाले या रूम, अफ़ग़ानिस्तान और मिश्र में कोई बात कह सके । गवर्नमेंट अंगरेज़ी को अदालत का ज़माना है। शेर और बकरी का एक घाट पर ठिकाना है । यह दाग नहीं बल्कि क़रान की हुलिया है। इसके मिटने से क़ुरान क़ुरान न रहेगा । पारसियों, यहूदियों और हिन्दुओं की किताबों का अपहरण
रह जायगा ।
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लतीफ़ा – एक नैचरी से किसीने पूछा क्या आप विलायत गये थे क्या मक्को की हज्ज भी कर आये। जवाब में फरमाया
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कि मैं मक्के से बढ़कर काम कर आया हूँ । (यानी मलिका को सलाम कर आया ) बेशक मक्को से मलिका में एक लाभ ज़ियादह है ।
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“पार सायान रूये दर मखन्ट्रक | पुश्तवर किल्ल मी कुनन्द नमाज ॥ आंकि चूं पिस्ता दी दमश हमां मग्ज़ । पोस्त वर पोस्त हस्त हमचू पियाज़ ||
अर्थ - संसार के पुजाएं कि के पीछे नमाज़ पढ़ते हैं हमने उनको ऐसे देखा जैसे रिस्ता ( मेवा छिलका के ऊपर छिलका जैसे नियाज़ |
इस्लाम जिस तरह दुनियां मे फैला और जिस चीज़ के ज़ोर से इसका प्रचार हुआ उसका नाम जहाद है । और जिस को अहमदिया की सम्मति में राजा ( जहाद ) कहते हैं और उसका कर्ता ग़ाज़ी (घातक) कहलाता है । और यही अस्त्र है जिसकी भयंकर छेड़ से करोड़ों आदमी सच्चाई से पल्टा खा गये। चूंकि इस बात ने दीनमुहम्मदी के दिल में जहालत की आग को रोशनकर शहादत और वहिश्त ( बैकुण्ड ) के तेल से भढ़का दिया ।
इसलिये हम अत्यन्त आवश्यक समझते हैं कि इसका पूर्ण विवरण और हदीस और तारीखी किताबों से सव- साधारण के समक्ष रक्खें । हे परमात्मा सत्य का प्रकाशकर और असत्य का नाश ।
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पहिला अध्याय कुरान में ।
नम्बर १ सूरे अनफाल:- या अय्युहन्नवीओ हसिल मोमेनूना अल्किताले अय यकुन मिन्कुम इशुरुना सारूना
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गले मे अन वह यकुन मिन्कुम मेअतन यग्रलेवू अलफम मिनलजीना कफ़रू बे अन्नहुम कौमिल्लायफ़ कहून ॥
अर्थ – हं पैग्रम्बर ? शौक दिला मुसलमानों को लड़ाई का अगर हों तुम्हारे से बीस आदमी सत्र करने वाले गालिब (विजयी) होंगे वह दोसौ आदमियों पर अगर हो तुम्हारे से १०० आदमी ग़ालिब (विजयी) होंगे हज़ार आदमियों पर काफिरों से. इस सबब से कि वह गिरोह है जो नहीं समझते।
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पहिले यह आयत उतरी । लेकिन मुसलमान काफिरों के सामने न ठहर सके और भाग गये। इस सबब से खुदाही कुरान को भा अपनी भूल से इक़रार करना पड़ा। इसी वास्ते शाह वलीउल्लाह साहब तर्जुमा कुरान के हासिये पर लिखते हैं “कि चूंई आयद नाज़िल शुद वाजिव गश्त सवात वा दह चन्दां कुफ्फार, वाद अज़ां मन्सूख शुद | व वजूब सिवात दर मुकाबले दो चन्दां” ( दखो सफा १९७५ नवलकिशोर १२८६ हिजरी )
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जहाद ॥
वह आयत जिसने नम्बर १ को मन्सुख किया यह है । नम्बर २ सूरं अनफाल: – लन खफ्फल्लाहो अनकुम व अलिमा
साकुम ज़ाफन फअइ य यकुम मिन्कुम मेअतन
साविरतन यग्रलेवू में अतैने वअई यकुम मिन्कुम अलफुन यग़लेवू अलफेंन वे इज्निल्लाह वल्लाही मअस्साविरोन ।
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अर्थ - खुदा ने हल्का कर दिया तुम्हारे सिर से और जान लिया ख़ुदा ने कि तुम में कमज़ोरी है। पस अगर हों तुम्हारे सौ आदमी सत्र करने वाले ग़ालिब आवें दो सौ पर
और अगर तुम्हारे हों हज़ार आदमी ग़ालिब आवे दो हज़ार पर ख़ुदा के हुक्म से और ख़ुदा सत्र करने वालों के साथ है।
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इस पर शाह वलीउल्लाह साहब लिखते हैं “सिहावा अज़ असीराने बदर फिदा गिरफतन्द व इजतहाद खेश व मर्जी नज़दीक खुदाये ताला क़त्लई जमात वृद” लेकिन चूं वनस्सरी न शुदह वूदन्द अब फर्माद” सफ़ा १७५ सन् १२८६ हिजरी फ़ारसी क़ुरान ।
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अर्थ :- सिहावा ने बदर के क़ैदियों से बदला ले लिया अपनी मर्जी से खुदा ताला की मर्जी इस जमात के क़त्ल के वास्ते थी लेकिन चूँकि आयत में खुलासा हुक्म नहीं था लिहाज़ा माफ़ कर दिया गया ।
जंग बदर में जब लूट मार बहुत कर चुके और सैकड़ा आदमियों के मार डालने और क़ल कर देने के बाद बहुत सा माल असबाब जमा कर लिया। तो खुदा फर्माता है ।
नम्बर ३ सूरे अनफाल:- या अय्यहन्नवीयो कुल्लिमन फी एहदीकुम मिनल असरा अई याला मल्लाहो फी कुलूवेकुम खैरन यूलेकुम खैरम, मिम्मा अखज़न मिन्कुम व इगफिर लकुम वल्लाहो गफूरुर्रहीम |
अर्थ :- हे पैग़म्बर उन क़ैदियों से जो तुम्हारे हाथ में हैं कि अगर जाने खुदा तुम्हारे दिल में नेकी यानी ईमान तो बेशक देगा तुमको विहतर उस ( माल व असबाब ) से जो तुम्हारा लिया गया है और तुमको मुआफ़ कर देगा और खुदा वानेवाला मिहर्बान है । और लूट के माल की बाब ख़ुदा कहता है । “फकलू मिम्मा ग्रानिम तुम हलालन तय्यबन” खाओ लूट
के माल से हलाल पाकोज़ह यानी वह तुम्हारे
लिये बहुत ही अव्वल दज का हलाल है। सच्चे मुसलमानों की तारीफ़ क़ुरान में ख़ुदा इस तरह और इन लफ्जों में करता है ।
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नम्बर ४ सूरे अनफाल :- वल्लज़ीना आमनू व हाजरू व जाहडू फीसवी लिल्लाहे वल्लज़ीना अओ वाउ नसरू ओलायका हुमुल मोमिनूना हक्कन लहुम यस फिर तुन व रिज़कुन करीम ।
अर्थः– और जो ईमान लाये और हिजरत की और जहाद की ख़ुदा के रास्ते में ( यानी दीन मुहम्मदी के फैलाने की खातिर ) और जिन्होंने जहादियों को जगह दी और उनकी रुपये वगैरह से ) मदद की ऐसे आदमी वही हैं जो सच्चे मुसलमान हैं। उन्हीं के वास्ते मुआफी है और नेक रोज़ी और इससे अगली आयन में भी उन लोगों को जो आइन्दा दीन इसलाम की खातिर जहाद करें या करेंगे, भी सच्चे मुसल- मानों में शुमार किया है । फिर ख़ुदा और जगह भी
है।
मुसल- मानों की तारीफ़ करता है ताकि वह जहाद करने में दिलोजान से हिम्मत करें और दीन मुहम्मदी फैलायें । यह आयत यह है ।
नम्बर ५ सूरे मायदा “अज़िल्लतन अलल मोमिनीना अइज्ज़तुन अलल काफ़िरीना सम्मु जाहिदूना फी सवो लिल्लाहे वला यखाना लौमतुन लायमुन जालिका फदलुल्लाहे” ।
अथ: - ( मुसलमान लोगों की तारीफ यह है गोया एक क़िस्म की हुलिया है) वह तवाज़े ( विनय ) करने वाले हैं मुसलमानों पर । सङ्गती करते हैं काफ़िरों पर । जहाद करते हैं ख़ुदा के रास्ते में और मलामत करने वालों की मलामत से नहीं डरते यह ख़ुदा की वरवशिश ( दैन ) है ।
- जहादियों का एक बड़ा गरोह जो हिन्दुस्तान से भागकर एक बहुत अर्स से हद्दे पेशावर पर नकोर (स्थान) का नाम ) के करीब रहता है। जिनमें सताना चाकरूर की मुहिम ( चढ़ाई ) में सैकड़ों जहन्नुम (नरक) में चले गये हज़ारों हिन्दुस्तान के मुसलमान रुपया भेजकर इनकी कुरान की इसी हिदायत के बमूज़िब मदद किया करते हैं। जो एक सूरज की तरह रौशन बात है । ( तारीख हज़ारे में इनका खुलासा हाल दर्ज है ) ।
नम्बर ६ सूरे तांबा :- “फ़इज़ा सलखल अशङ्कुरुल हरुमें फकतुलुल मुशरकीना है सो बजद तुम्हुम व खुजूहुम व सुरुहुम व अकदूलहुम कुल्लो मुर्सदन फइन ताबू व अकामुस्स- लाता व आतुज्ज़काता फरबल्लुसबीलहुम इन्नल्लाहा ग्र
होम |
अर्थः–पस जब मुमानियत (यानी हराम ) के महीने गुज़र जायें तब मुशरिकों को मार डालो जिस जगह पाओ पकड़ो उनको और क़द करो उनको और कल व गिरफ्तारी के लिये घात में बैठो यानी छुपकर | ( गरज़ कि
जिस होला हवाला मकर फरेब से हो सके पकड़ो, मारो, क़द करो ) ( अलबत्ता एक शर्त पर रिहाई भी है और वह यह है ) (अगर वह अपने दोन से ) तोबा करें और नमाज़ पढ़ें और ज़कात दे तब उनको बगैर कत्ल करने के छोड़ दो। ग्ररज़ यह कि ( वग़र मुसलमान करने या क़त्ल करने के मत छोड़ो ) तहकीक (ख) खुदा वख़्शने वाला मिहन है।
सूरे तोबा आयतः व इन अहदुम मिनल मुशरिकीनस् तजारिका फ़ाजिरतन हत्ता यस्मओ कलामल्लाहे सुम्मा अवलगा मामिन हो ज़ालिका वे अबहुम क़ौमुल ला यालम्न ।
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अर्थ:- ( और इससे आगे कुछ अर्सा सोच कर भी ईमान लाने की वहालत क़ैद रहने की इजाज़त दी ) कि कोई मुशरिकों से अगर अमान मांगे तो उसको अमान (शान्ति) दो ताकि वह क़ुरान को सुने जब सुन चुके तो उसको पहुँचादे लशकर #गाह इस्लाम में और यह इस वास्ते है कि वह लोग क़ुरान
से नावाकिफ़ ( अज्ञानी ) है ।
नम्बर ७ सूरे तोवा :- वतअनू फी दीनेवुम फक़ातिलू अइम्मतुल कुफरं ।
अथः – जो लोग ऐतराज़ या ताना करते हैं तुम्हारे दीन पर पस क़त्ल करो ऐसे बड़े काफ़िरों को ।
नम्बर ८ सूरे तोबा. - इनकुन तुम मोमिनीना कातिल हुम विपरिन विहु मुल्लाहो वि एदीकुम व नजिज़ हुम व इन फिरकुम अलैहिम |
अर्थ:- अगर तुम मुसलमान हो तो जंग करो उनके साथ तो खदा तुम्हारे हाँथों उन्हें सज़ा दे और उनको रुसवा करे और तुम्हें जीत दे ।
नम्बर ६ सूरे तोबा : - या अय्युहन नबीओ जाहिड्डू खलफू बल मुन क़ईना व अगलज़ा अलैहिम व यैदीहिम व मा जहन्नुम ।
- कोई गलती न खाये ‘मामिन हो” के मानी कैदी का घर नहीं वल्कि इससे मुराद लश्कर गाह ( छावनी ) इस्लाम है । जहाँ उनको ईमानलाने तक क़त्ल होने से अमन ( शाँति ) होगा । या मुसलमान होकर लोगों के क़त्ल से अमन (रक्षा) हो क्योंकि जहाद के वक्त में सिवाय मुसलमान होने या क़त्ल होने के कोई अमन का सामान क़रान में नहीं हैं।
अथ: - हे पैग़म्बर जहाद कर काफ़िरों से और जहादकर मुनाफिकों (अन्याथियों) से और सख़्ती कर उन पर और जगह उनको दोज़ख ( नरक ) है
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इस पर शाह वलो उल्ला साहब टिप्पणी करते हैं कि “जहादकुत व सैफ़ व सख़्ती कुन व जवान " १८७ नवलकिशोर
नम्बर १० सूरे तोबा - इन्नल्लाहस तराभिनल मोमिनीनल अनफुसहुम वअम वाले हिम विअन हुमुल जिन्नतो युकातिलूना फीसवी लिल्लाहे फ़यक तुलूना वयक तुलूना व अदन अलैहे
हक्कन |
अर्थ: - तहक़ीक ( सब ) खदा ने खरीदलों मुसलमानों की जानें और उनका माल व एवज़ इसके कि उनको बहिश्त ( बैकुंठ ) देगा । ( किन लोगों को ) उनकी जो जंग करते हैं ख़ुदा के रास्ते में पस क़ल करते हैं और कल होजाते हैं बमूजिव सच्चे बादे खदा के ( यानी हूरो ग़िलमान ( गुलामों ) बिहिश्ती की खातिर )
फ़ाजिल खोज करनेवाले शाह वलीउल्ला साहब देहलवी फ़म्मति हैं । “दर जहाद अहद कर्दा व क़सम खुरदह दग़ा- करदन व सवव आनस्त कि काफ़िरों मिनवार कौल ईशांरां मौतवर नदानंद व ईशाँ सुरबत न दारन्द वल्कि मुसलमाना दर शुवह उफतन्द” ( सफे २५६ नवलकिशोर )
नम्बर ११ सूरे तोबा :- “या अय्यहल लज़ीना आमनू क़ातलुल्ल जीना यलूनकुम मिनल कुफफारे वले बजडू फा कुम गिलज़तुम वालम् अन्नलाहा मअल मुत्तकान |
अर्थ :- हे मुसलमानों ! जो काफ़िर तुम्हारे नज़दीक हैं उनके साथ किताल करो ( लड़ो ) और चाहिये कि काफ़िर
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लोग तुम्हारे में गिलाज़त यानी बे रहमी या सख्ती पावें । और जानौं कि खुदा मुसलमानों के साथ है ।
नम्बर १२ सूरे तोबा : - यु जाहिद्द वे अम्वाले हिम व अन फुसेहिम वल्लाहो अलैहिम बिल्मु त्तकीन ।
जो जहाद करते हैं अपने माल से अपनी जान में ऐसेही परहेज़गारों को ख़ुदा जानता है ।
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नम्बर १३ सूरे तोबा :- लक़द नसर कुमुल्लाहो फी मवा- तिना कसीरतिन व योमा हुनैनिन इज़ा आजवतु कुम कसरतो कुम फलम तअना अन्कुम शैअन वज़ाक़त अलैकुम अर्जी विम्म रहलत सुम्मा वल्लयतुम मुदविरीन ।
अर्थः- तहकीक़ ( स ) फतेह दी तुमको खुदा ने बहुत जगह में और हुनैन के रोज़ भो (जब हुनैन की लड़ाई हुई थी उस दिन ) जब तअज्जव (आश्चर्य) दिलाया तुमको तुम्हारी कसरत ( बहताहत ) ने पस दफे ( डूर ) न किया इस जियादती (अत्याचार ) ने तुम्हारे से कुछ चीज को और तंग हुई तुम्हारे पर ज़मीन बावजूद उसको फराखी ( फैलाव ) के | पस तुम भगो पीठ देकर ।
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(नोट) “लिखा है हुनैन की लड़ाई में बावजूद फिरिश्तों की भी बहुत सी मदद के एक बारगी शिकस्त खाई अक्सर मुसलमान ज़ख्मी हुए और ४ शहीद हुए (देखो मदारे जुम्नच्बत जिल्द दोम )
अङ्ग उहद की बाबत शेख अब्दुलहक़ लिखता है कि जङ्ग उहुद में जब लश्कर इस्लाम ने शिकस्त खाई । एक गरोह कुरैश मुहम्मद की तरफ़ आया और चारो तरफ़ घेर लिया अली से हिफ़ाज़त की इल्तिजा की। जिसने अच्छी तरह
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शिजाअत ( बहादुरी) दिखलाई और जित्राईल और मीकाईल भी इमदाद के वास्ते मौजूद थे मगर ७० मुसलमान मारे गये । खुद मुहम्मद साहिब ज़ख़्मी हुए और मुद्दों में पड़ गये। दांत भी काफिरों की जर्व ( चोट) से शहीद हुए देखो |– (मदारे जुन्नकुव्वत ) फिर एक और फ़ाज़िल मुआरिख फर्माते हैं कि उहुद में दुश्मन यानी काफिर लोग मोर्चा खाली देखकर सवारों की फौज इस्लाम के अकब आपड़े | हज़रत अमीर हम्ज़ा और अब्दुल्ला विजुवैर व नामी सर्दार असहाब शहीद और हज़रत अली और हज़रत उमर और
हज़रत अकूवकर मरू (जमा) हुए एक और बहादुर और शुजा नेक वक्त औरत सिपहसालार लश्कर कुफफार ने जिसका नाम वन्दा विन्ते अन्ता जोज़े अबू सुफियान बहादुर अलैहिर्रहमत है अमीर हम्ज़ा का जिगर चीर कर चबाया और मुसलमान मारे गयाँ के कान और नाक काटकर उनके हार बनाकर गले में पहिनें । [ मुफस्सिल देखो : ज़रकानो वरमुवाहिव लदीना जिल्द दोम् सफ़ा ६० व ६१ ] और यही जिक्र मौलवी नूरुद्दीन ने फजलुल खिताव में भी किया है (देखो वाब जहाद )
"
जङ्गवदर की बाबत मुवर्खे खून लिखते हैं। खुदा ने मुहम्मद साहब से वादा किया था मगर कसरत फौज मुखालिफ़ से मुहम्मद साहब घबरा रहे थे अबू बकर ने तसल्ली दी । सैय्यद विन मआज़ ने भी तसल्ली दी कि घास के झोंपड़े में आराम कर किनारे पर और घोड़ा मौजूद रहे हम लड़ेंगे अगर खदा ने गलवा दिया तो विहतर वर्ना आपको व तरफ़ मदीना भागना विहतर है। हज़रत इस कलाम से खुश हुए और उरेश में तशरीफ़ ले गये । ( जिल्द दोम मुदारे जिन्नावुव्वत )
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मौलवी नूरुद्दीन साहब जङ्गवदर की बावत लिखते हैं हासिलुल उमरा इस लड़ाई में मुसलमान फ़तहयाब हुए और सत्तर के क़रोब कैदी कुरैश गिरफ्तार हुए। जिनमें से फक़त २ मसलहतन काल किये गये वाको छोड़े गये फसलुल खिताब व मुक़द्दमा अहलुल किताब सफ़ा १३१ क़ुरान से वाज़े है कि बदर की लड़ाई में १००० फिरिश्ते मुहम्मद के मददगार थे और जगह से ५००० फिरिश्ते मालूम होते थे । फिरिश्तों ने भी लड़ाई की। और मुहम्मद के जहादियों ने भी ।
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मुहम्मदी लश्कर
फिरिश्ते
कुल मीज़ान लश्कर
१००० या ५०००
२५०० या ६५००
मगर काफिर यानो मुखालिफ ने दोन मुहम्मदी बहुत थोड़े थे । इस सूरत में मुहम्मदियों और फिरिश्तों को कोई बहादुरी नहीं हालांकि फिरभी १४ मुसलमान याना : मुहाजिर ( तीथ बात्रा) और ८ अवस्थार का काफिरों ने सर काट
लिया ।
उहद को लड़ाई की बावत हाशिये क़ुरान पर लिखा है । “दर ग्रज़वये उहुद अहिले निफ़ाक़ मेल करदन्द व आंकि दर शहर मुतहस्सिन सबन्द व असहाब ख्वा सतन्द कि वेरूं आम्दा जङ्ग कुन्द वाद अज़ां कि हज़ामियत वाकै शुद मुनाफिकान इरा मिले तान गिरफतन्द व वक हब हज़रत पैग़म्बर वसोहबे जमात मुकैयद साखतन्द कि अर्ज़ीींजान जुम्बद चू असार फतह जाहिर शुदन्द गिरफ्त आं जमाअत दर पये गारत उक्तादन्द व इसयां पैग़म्बर करदन्द वशोमी इसियां हज़मीयत वर मुसलमानान उत्पादह अमा फरार करदन्द
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इल्ला माशाअल्लाह दरों निवाला खबर शहादत हज़रत पैग़म्बर शायै शुदह मुनाफिकान कस्द इर्तदाद करदन्द हाशिया करान तर्जुम्मा शाह वली उल्लाह सफा ६२४ )
सूरे तोबा ! – कातिलुल्लज़ानाला योमिनूना विल्लाहे वलाविल योमिन आखिरे वला यज रिम मा हराम अल्लाह व रसूलही वला यदीनून | दोनुलहक़ मिनलजीना ऊतुलकितावे हत्ता यातुल जुज़यिता अन यहुम साचिरून ।
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अर्थः जङ्ग करो उनके साथ जो ईमान नहीं लाते खुदा पर और न क़यामत पर और हराम नहीं जानते जिनको खुदा और पैग़म्बरने हराम किया और सच्चे दोनको नहीं अग्तयार करते । बाकी रहे यहूद और ईसाई उनके वास्ते हुक्म है कि किताब वालों से यह कि वह देवें जिज़िया अपने हाथ से ख्वार होकर ।
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शाह वली उल्लाह साहब फर्माते हैं कि जङ्ग नाहक़ हेच गाह दुरुस्त नेस्त व जग का फिराने हमां वक्तु दुरस्तस्त सफ़ा १८२ हाशिया कुरान:-
फिर एक जगह लिखा है: — “हासिल जवाब आनस्त कि क़िताल कुम्फार जायदस्त सफा ३२ हाशिया क़ुरान |
सूरे तोवा :- व जाहिरू वेअम्बालेकुन व अन फुसेकुन फी सवी लिल्ला वलकुन व खैरुल्लकुन इनकुम तुम ताल मून ।
अर्थः– और जहाद करो अपने माल से और अपनी जान से ख़ुदा के रास्ते में यानी दोन ख़ुदा के वास्ते यह तुम्हारी भलाई है कि अगर तुम जानते हो ।
सूरे मुहम्मदः - फरज़ा बकी तुमुलज़ीना कफरू फज़खरि- काय हत्ता इज़ा असखन्तुम्बुम फसद्दल व साफ़ फ़यिमां
१४
मन्नम वादो व इम्मां फिदाअन हत्ता तजाअल हरबा औज़ारहा ।
अर्थः-पस जब लड़ाई करो काफिरों से तो उनकी गर्दने मारो और जब बहुत खूनरेज़ी कर चुको तब उनको मज़बूत क़ैद कर लो या अहसान से खुलासी ( आज़ाद ) करो इसके बाद या माल लेकर यहां तक कि लड़ाई में अपने हथियार रखदे |
सूरे निसा : - फइन तबलो फ़रवो CH
वक्तुलूहुम हैसो वजद तुमूहुम वला तत्तखजू मिन्कुम वलीयों वला नसीरा:-
अर्थ :- फिर अगर नहीं ( मुसलमान होते हैं) तो उनको पकड़ो और मारो जहाँ पाओ और न उहराओ उनमेंसे किसी को मददगार |
सूरं फातिहा :- कुल्लिख मुखल्लफीना मिनल आराबे सतद ऊना इला कौमुल औला वासिन शहीद तु कातिलून हुम आओ सल्ले मूना ।
कहदे ( अये मुहम्मद ) पीछे रहगये ऐरावियों ( देहातियों) को कि आगे तुमको बुलावेंगे। एक बड़ी सख्त लड़ने वाली क़ौम पर तुम उनको क़लकरोगे या मुसल्मान होये ।
अब वह आयतें जिनमें मुहम्मद साहब ने ऐराबियों को दौलत की लालच और लूट मार को तरगीव दी है दर्ज करते हैं।
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सूरे तोबा : - या अईयो हल्लज़ीना आमानू इनमल मुशर कूना नजसुन फला यकरिवुल मसजिदिल हरामे वादा आमेहिम
१५.
हाज़ा व इन खिफ़तुम अतीयतुन फसौफ़ा यगुनी कुमुल्लाहो मिल्फज़लेही ।
अर्थ :- हे मुसल्मानो सिवाय इसके नहीं है कि मुशरिक लोग नापाक हैं । पस चाहिये कि नजदीक मसजिद हराम यानी खाना काबे के न आयें। बाद इस साल के (उनसे लड़ो) अगर डरते हो फ़कीरी से पस खुदा तुमको मालदार करदेगा अपनी कृपा से ।
1
सूरे निसा : - फ इन्दल्लाहे फगालिमा कसीरन ।
अर्थ:-
:- अल्लाह के यहां गनीमतें यानी लूट का माल बहुनहै ( यानी जब तुम जहाद करोगे तो बहुत सा माल लूटोगे जो तुमको अल्लाह देगा ) ।
जंग खैवट में लवीडरों को हज़रत लूट की तमै देकर ले गये थे । जब उसमें फतह होचुकी तो खुदाने मुसलमानों के क़ौल मुन्दर्ज़ा ज़ैल आयत नाज़िल की ( उतारी ) ।
सूरे आज़ाब :- व अओ रसकुन अर्जहुम व दियारहुम व अम्बालडुम व अजलिडुम लतूहम व कानल्लाहो अलाकुले रौइन क़दीस |
अर्थ:- और आखिरकार खुदान तुमको उनकी ज़मीन दी घरों के माल उनके और उनकी ज़मीन भी और जिसपर नहीं फेरे तुमने क़दम अपने और ख़ुदा हर चीज़ पर क्रादिर है ।
सूरे आल इमरान:- वलाक़द सदक़ा कुमुल्लाहो बादहू इज़ तुहिब्बू वहुम वे इनही ।
अर्थः - और तहक़ीक़ खुदाने सबा किया तुम्हारे हक़ में वादा अपना जब तुम क्रल्क करते थे काफिरों को ख़ुदा के
१६
हुक्म
इस आयत के ( मातु हिब्वूना ) के लफ्ज़ से साफ़ जतला दिया कि लूट मार की खातिर बहुत लोग जंग में शामिल होजाते थे और दीन इस्लाम फैलता जाता था ।
सूरे फता: - “सयकूलुल मुखलेना इज़न तलफ़तुम इला मग्रानिमा लिताखजूहा ज़रूना वितत अकुम ।
अथः - तो कहेंगे तुमको पीछे रहे हुए आराव लोग ) जब तुम चलोगे लूटमार की तरफ़ तो छोड़ो हम भी चलें तुम्हारे साथ यह आयत मुन्दर्जा वाला जंग खैवट के व नाजिल हुई थी ।
आगे इसी सूरत फतह में मुहम्मदिय को
बहुत सी लूट मार की गई अलफ़ाज ( इसी तौर पर ) तरगीब दी है बादह कुमुल्लाहो मग्रानिमा कसीरतन यानी वादा दिया है खुदाने तुमको बेशुमार लूट का जिसकी बदौलत लाखों जाहिल ग्राज़ी मर्द बनकर लूटमार को दीन मुहम्मदी जानकर जौहिदू फी सब लिल्लाह के शौक से कमर बस्ता लोगों के ईमान और उनके लड़के वाले लौंडी गुलाम और वालिंग और निकाह की हुई औरतें ज़िना ( प्रसंग ) करने के वास्ते लूट लाने पर दिलोजान से तय्यार होगये । जिसका मुफस्सिल हाल सूरे अनफाल में दर्ज है।
अब हम वह आयतें बतलाते हैं जिनमें फौजी
मिपाहियों को दूसरों की व्याहता औरतें वास्ते जिना के देने की तरग़ीब है।
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सूरे निसा :- " बल मुह सिनातो मिननिसाये इल्ला माम- टकल ऐमानोकुम” |
१७
तजुमा: - और हराम की गई हैं ऊपर तुम्हारे शौहरदार औरतें मगर सिवाय उनके जिनके मालिक हुए तुम्हारे हाथ ।
सूरे अहज़ाब : …“मा मलकन ऐ मानोकुम” ।
अर्थ- जो औरतें तुमने लड़ाई में टूटीं वह तुम्हारे हलाल हैं।
सूरे निसा : - फअन केऊ मानावन्यकुम मिननिसायसना बसलासा बरुवाओ फइन खिफ़तुम इल्ला ता दिन्द्र अफवा हिदतुन औमामलकत ऐ मानकुम ।
अथ: - -पस निकाह करो जो खुश आवे तुमको सब औरतों से दो दो तीन तीन चार
अदल ( न्याय ) नहीं कर सके तो एक से निकाह करो। या
लूट की लौडी से सुहबत करें और अगर जानों कि
करो । तफसीर कशाफ़ में लिखा “युरोदो मा मलकत ऐ मानहुम मिनल्लाती सबीना बलहुन्ना अज़ वाजुन फी दारुल कु फे फहमन हलालन नुग्ररातिल मुसल मीना व इन कुन्ना मुहस नातिन ।
अर्थः- हाथों के मालिक हो चुकने से यह मुराद है कि वह औरतें लड़ाई में बन्दी होकर उनके हाथ में आई हों पस वह औरतें मुसलमान गाज़ियों के लिये हलाल हैं अगर्चे वह शौहरवाली हों ।
दू
सूरे बक़र: - इन्नु उज़ोना आमनून बल्लज़ोना हाजरू बजाह फी सबी लिल्लाहे उलायका यरजूना रहमतुल्ला हे ।
अर्थः- तहक़ीर जो ईमान लाये और घर कोई और जहाद किये जिन्होंने खदा के रास्ते में वह उम्मेदवार खुदा की रहमत के हैं ।
१८
सूरे सफ़ा :- तूमिनूना विल्लाहे वरसूलही व तुजाहि दुना फीसवी लिल्लाहे विअम वालेकुम व अनफुसे कुम जालिकुम खैर ।
अर्थः- ईमानलाओ खुदा और पैग़म्बर पर और जहाद करो खदा के रास्ते में माल से और जान से यह तुम्हारे को विहतर है ।
लूट के माल की तकसीम ॥
सूरेअनफाल: - वअलम् इनमा ग्रनिम तुम मिन्शै इन फ़इबल्लाहा खुमराहू वररसूल व क्रज़ल कुर्वा वलीयतामा वल मसाकीना ववनिस्सवील इन कुन्तुम आमन्तुम विल्लाहे ।
अर्थः- और जानो कि कुछ लूट हासिल हुई काफ़िरों से हर किस्म की चीजें पांचवां हिस्सा इसमें ख़ुदा का है और पैग्रम्बर का है वास्ते रिस्तेदारों और यतीमों और फकीरों और मुसाफ़िरों के ।
लिलफुखरा की तसरीह मुसनिफ़ क़ुरान खुद करता है । “लिलफुखरा इल मुहाजिरीन” यानी आं फकीर आ हिजरत कुनिन्दा ( वह फकीर हिजरत किये हुए है । )
सूरे तोबा :- अदल लाहुल्लज़ीना आमत् मिन्कुम व आमि- लुस सालिहाते ले अता खल्लफ़ाहुम फिल अरज़े कमा इस्तख ल फल्लज़ीना मिन क्रब्ले हिम 1
अर्थः–वादा देता है अल्लाह उनको जो ईमान लाये हैं और नेक अमल करते हैं। अलवत्ता खुदा तुमको खलीफ़ा यानी हाकिम बना देगा ज़मीन में जैसा कि हाकिम किया है उनको जो पहिले थे ।
1
१६
सूरे सफ़:- या अय्यहल्लज़ीना आमनू अहले उलायकुम अला तिज़ारतन युन जीकुम मिन अज़ाविन अलीम् ।
अर्थ :- हे मुसलमानो तहक़ीक दलालन करता हूं तुम तरफ़ उस सौदागरी के यानी जहाद के कि तुमको छोड़दे बड़ी सज़ा से । 1
मौलवियों के फुजूल उज्रात का जवाब |
बाज़े नावाकिफ़ और बहस से घबराये हुए मुसलमान नकली दीन की खराबी समझकर नअस्सुब के सबब से उसे छोड़ना गंवारा न कर नीचे की आयतों को जवरी के दीन को मुखालिफ़ पेश करते हैं जिनको हम वैसे ही दर्ज करके फिर उनकी तर्दोद (खंडन ) सुनाते हैं । हैं।
आयत १ सूरे बक़र: - ला इक़राहा फिद्दीन क़द नयनर रुसदे मिनलहई |
तर्जुमा:- जब करना नहीं है वास्ते दोन के तहकीक ( सच ) जाहिर हुई हिदायत गुमराही है ।
इसका पहिला जवाव : – शाह वली उल्लाह साहब देते हैं हुअते इस्लाम ज़ाहिर शुद पस गाया जब करदन नेस्त अगचि फिल जुमला जब वाशद सफ़ा ४१ फ़ार्सी कुरान ।
अर्थ:-इस्लाम में हुअत ज़ाहिर हुई फिर जब करना नहीं, है अगर्चि कुल जवर हो ।
।
।
दूसरा जवाब : - मुफस्सिल हुसेनी देता है गुफतअन्द हुक्मई आयत व आयत क़िताल मंसुखस्त अज़ तमाम क़वायले अरब जुज़ दीन इस्लाम क़बूलत बूद अम्मां वा दीगरां क्रिताल वायद कर्द ता जुज़िया क़बूल कुनन्द ।
२०
अथ: - हुक्म इस आयत का लड़ाई की आयत पर मन्सुख है तमाम अरब के कपीलों से सिवाय दीन इस्लाम के क़बूल न था लेकिन दूसरों के साथ लड़ाई करनी चाही ताकि यह जिज़िया कबूल करलें । सुफ़ा ४८ वम्वे सन् १२७६ हिजरी ऐसा ही इत्तिकान (किताब) में फ़ाज़िल जलालुद्दीन सयूती ने लिखा है ।
जवाब तीसरा :- खद कुरान भी इस आयत को रद्द करता है क्योंकि तमाम खोज करने वाले मुसलमानों की मन्सूखी करानी आयतों की बाबत यह राय है कि “ज़रूरत वूद रवा वाशद” बे ज़रूरत चुनी खता बाराद |
अर्थ:- अगर ज़रूरत हो जायज़ है वे ज़रूरत ऐसी खता करनी) जैसा कि सूरे बक़र में लिखा है “कितावन अलैकुमुल किताला वहुवा कर हल्लकुन व असाअन तकरहू रौआ वहुवा खैरुल कुम् ।
अर्थः – तुम्हारे पर लाज़िम किया गया लड़ाई करना और वह तुम्हें (बमुजिब उस आयत के ) जत्र मालूम होता है और शायद तुम उसको नाखुश रखते हो हालांकि तुम्हारे वास्ते विहतर है।
1
जवाब चहारुमः सुरे अनफाल में लिखा है “कुलिल्लज़ीना कफरू अई यनतहू यगु फिर लहुम माक़द सलफ़ व अई यहूदा बाफ़क़द मुह सनातन सुन्नतुल अव्वलीन वकातलूहुम हत्ता लातकुना फितनतुन व या कूनद दीना कलामल्लाहे ।
अर्थः- काफ़िरों को कहो अंगर बाज़ आवे कुफ से मे मुआफ हो उनको जो हो चुका और अगर वह दुबारा करें यानी कुफ तो पड़ चुकी यह अगलों की और जंग किबाल
करो काफ़िरों से यहां तक कि फितना कुफ़ बाकी न रहे
होजाये सब दीन अल्लाह का ।
२१
और
पस साफ़ ज़ाहिर है, कि क़रान जहाद को आम तौर पर और खुल्लमखुला तालीम देता है।
दूसरी आयत जिसको मौलवी साहिबान दोन विलज के खिलाफ़ पेश किया करते हैं यह है ।
सूरे काफिरून : - लकुम दीनकुम वलेयदीन ।
अर्थ :- तुमको तुम्हारा दीन और हमको हमारा दीन । उसका जवाब अव्वल : - तफसीर जलालैन में लिखा है लकुम दोनकुम मुश्शिर्का बलयदीनिल इस्लाम व हाज़ा क़वली ना योमा विलहवें ।
अर्थः- तुमको तुम्हारा दोन से मुराद शिक है और हमको हमारा से मुराद इस्लाम है और यह हुक्म इस्लाम में लड़ाई ( जहाद ) शुरूअ होने से पहिले का है ।
जवाब दोयमः एक और लायक मौलवी खुद जवाब देता है। एक वक्त यह था कि “लकुमदीन कुम वले यदीन” का हुक्म हुआ और एक वक में सदाये उक्त लुल मुशरकीना है सो वजतुमुहुम् (यानी क़त्ल करो मुशिरिकों को जहाँ पाओ ) दिलों में जोश डाला जबकि शुरू इस्लाम था और गल्वा ( शोर) नहीं था तो ( पहिला ) हुक्म हुआ और जब ग्रल्वा होगया और शरारत कुफाफार बढ़ने लगी तो दूसरा हुक्म हुआ । ताईद इस्लाम सफ़ा ३८
जवाब सोम: - क़ुरान देता है ।
सूरे तहरीम:- या अय्यहुन्नवीओ जाहदुल कुफफारा
२२
वल मुनाफिनीना वग्रलुज अलैहिम वमा वाम जहन्नम् व वे सल मसीर |
अर्थ :– हे पैग़म्बर जहाद कर काफिरों से और जहाद मुनाफिकों से और सख्ती कर उन पर और जगह उनकी दोज़ख है और वह बुरी जगह है ।
जवाब चहारुमः -
मौलवी हुसेन उपदेशक मुसन्निफ़ तफ़सीर हुसेन देता है कि “ईआयद ब आयत सैफ़ मन्सूख शुदह सफ़ा ३७३ जिल्द दोम् सन् १८७६ ई०
और देखो क़ुरान सूरे बक़र : - “यस अलूनिका अमिश्श हरिल हरामे कितालुन फीहे कुल कितालुन फोहे कवीर” ।
अथ: - सवाल करते हैं तुझसे हराम के महीने में लड़ाई करने से कहो जंग करना इसमें बड़ा काम है और देखो ।
सूरे हज: - बजाहिदू फिल्लाहे हक्का जहादही हुबज तवाकुम बमा अला अलैकुम फिद्दीने मिनहरज |
तर्जुमा: - जहाद करो ख़ुदा के रास्ते में जहाद के हक़ के मुताविक यानी बिला दरेन उसमें यानी ख़ुदाने चुना तुमको और न रहने दी तुम्हारे वास्ते दोन में कुछ कमी ।
पस साफ़ जाहिर है कि जहाद से ही दोन इस्लाम की तरक्की हुई और तकमील ।
तीसरी आयत: - जिसको हमारे मुहम्मदी भाई दोन बिल जब के खिलाफ पेश करते हैं यह है ।
सूरे महतहिना : – “इन तवर्रुहुम बतक सितू इलैहिम इन- लाहा यो हिब्बुल मुकसतीन ।
२३
अर्थ :- अहसान करो तुम उनसे और इन्साफ़ करो उनकी तरफ़ तहक़ीक़ अल्लाह दोस्त रखता है इन्साफ करनेवालों को उसका जवाब सही यह है कि जनाब मौलवी साहिबान आप इस आयत का पहिला हिस्सा जाहिर फर्माते हैं मगर उसके दूसरे हिस्से को छुपाते हैं। ज़रा आखें खोलकर देखिये उसमें क्या लखा है ।
इन तबल हुम बगैयतबल हुम फौलाइका हुमुज्ज़ालिमून ।
अर्थ:- मन करता है तुमको ख़ुदा उससे कि तुम दोस्ती रक्खो उनसे और जो कोई दोस्ती रखते हैं उनसे वो ज़ालिम हैं ।
9
और ज़ालिमों के हक़ में मुसनिफ क़ुरान लानत करता पस काफिरों से अहसान करने वाले और उनसे इन्साफ करने वाले ज़ालिम और मलऊन होते हैं देखिये कितना इख्तिलाफ़ और इन्साफ का खन हो रहा है।
1
अब हम और एक दावा भी रद करते हैं और यह यह जैसा कि आम तौर पर और खास तौर पर मुसलमान तहरीर करते हैं । हिरकल ने जो सवालात किये थे उनमें से छटा यह था कोई उस ( मुहम्मद साहब ) के दीन से फिरने वाला होता या नहीं उत्तर नहीं ( दौलत फारूकी सफ़ा २१२ ) मगर हम तफ़सीर से साबित करते हैं कि यह कौल मुसलमानों का बिल्कुल गलत है और बिल्कुल बेकार है। जैसा लड़ाई के मैदान में सिपाहियों की मज़बूती और जोश दिलाने के लिये बुद्धिमान सेनापति हर तरह की तदबीरे काम में लाते हैं मसलन दिल बढ़ाने वाली दलीलों और दूसरे ज़रियों से उनके दिल बढ़ाते हैं और उनकी हिम्मत को घटाते हैं। वैसा ही मौका पड़ने पर और मुशकिलों के पेश आने पर बुजुर्ग
२४
- जहाद #
क़ुरान भी ऐसी हो तदवीरों को काम में लाता है और ठीक अरब वालों के दस्तूर के मुआफिक जैसे कि लड़ाई से भागने वाले कमज़ोर पड़ते थे और जमा होकर तीर व तफना से बढ़कर काम निकालते हैं। कुरान ने भी शिकिश्त दिल मुसल- मानों के ज़ाहिर करने वाली दिल की ताक़त को मज़बूत करने के लिये जमा करते हुए के बजाय असर डालने वाली आयतें कहीं हैं । जिन्होंने मज़बूती और बहुब से विरो- घियों के समक्ष तलवार और भाले का काम दिया । (फसलुन खिताब सफ़ा १२८) क़रान दीन के बढ़ाने की खातिर काफ़िरों मुशरिकों, मज़हब के विरोधियों से लड़ाई करता है। धन का लालच, गुलामों औरतों का लालच हुकूमत का लालच
लूट मार का प्रलोभन देकर लड़ाता है ।
|
और हूरों गुलामों के मिलने की तरग्रोब देकर जाहिल और ग़रीब देहातियों को शहीद कराता और ग्राज़ी बनाता है ।
क़ुरान की बात २ से बिलजन की शहादत मिलती है और उसके फ़िकर २ से कतल और जंग की बू आती है । जहाद को क़ुरान हिज़ारत बतलाता है कि अगर लड़कर मर गये हूरें गुलाम मिलेंगे और अगर जीत गये तो लोगों की बेशुमार औरते और लड़के और ऊँट खिदमत और हराम खोरी बदफैली के वास्ते मौजूद होगे । मुहम्मदियों की लड़ाई की वजह खालिद ने अपने सिपाहियों से यह बयान की है कि तुम रूम की तमाम फौज़ को देखते हो। तुम इससे बच कर जा नहीं सकं । मगर जब तुम्हारी फतह होगी सारा शाम का मुल्क तुम्हारी ताबेदारी करेगा पस तुमको चाहिये कि शोक से मज़हब के वास्ते लड़ो ( दौलत फारुकी सफ़ा १२२० महराव सोम रुकनअब्बल ) ।
२५
ने
जो जो चीजें देहातियों को चाहिये थी वही २ ख़ुदा गांव वालों की खातिर जिन्नत में मौजूद कीं । कहीं भी कोई हिन्दुस्तान या चीन या क़ाबुल या फिरंगिस्तान या काफ़ि- रिस्तान का खास मेवा वहां ( बिहिश्त में ) नहीं रक्खा ग्रालिबन उसे मालूम नहीं था अरब को पानी की ज़रूरत थी और दूध की ज़रूरत थी सब बिहिश्त में मौजूद कर दीं । मगर सवाल यह है कि हिन्दुस्तानियों के लिये क्या क़ुरान खामोश है ।
दूसरा अध्याय हदीम से ।
हमने पहिले अध्याय ( बाब) में क़ुरान की आयतों की शहादत से मुसलमानी जहाद का सबूत अत्यंत संक्षेप से दिया है अगचे सच्चे और खोजी पुरुषों के लिये वह पूर्ण औषधि है। क़रान आदि से अन्त तक ऐसी ही हिदायतों से भरा हुआ है और मुहम्मद साहब का मरते वक्त तक अमल का यही दस्तूर रहा है । खलीफा की राह चलने वाले भी इसी के पैरों रहें और सब सेनापति इन फौज़ों से यही कहते रहे हैं कि पैग़म्बर साहब ने फर्माया है ।
हदीस:- अल जिन्नतो लहता जलालुस सय्यूफ़”
1
अर्थः - विहिस्त ( बैकुण्ठ ) तलवारों के सायेके नीचे है इस बात को मुहम्मद साहब ने सिफ फर्माया ही नहीं बल्कि अमल भी कर दिखाया। जिससे कोई सभ्य इतिहास लेखक इन्कार नही कर सक्ता । सिपाह सित्ता (पुस्तक) में जो मुहम्मदी मज़हब की हदोसों का संग्रह है । एक अध्याय ही खासकर जहाद के नाम से मौसूम है और उसकी इज्ज़त और बुजुर्गी हर एक मुहम्मदी ईमान वाले को मालूम है ।
२६
हम सिर्फ़ ज़वानी ही नहीं बल्कि उन किताबों की असल इवारत लिखकर मुस्तनद ( प्रमाणित ) तर्जु में से शहादत लावेंगे और उत्तमता से सावित करके जहालत फैलाने वाले मिहरवानों को दिखायेंगे कि हदीसों में हज़रत मुहम्मद क्या फर्माते हैं। और आप उनके बर्खिलाफ़ क्या उल्टा समझाते हैं ।
अनरेविल सर सैय्यद अहमद साहब फर्माते हैं कि देश के जीतने के लिये फौजें भेजी जाती थीं तो उसके सर्दारों को जो हुक्म दिये जातंथे उनमें नीचे लिखो बानों पर निहायत ताकीद की जाती थी ।
(१) कोई औरत, और लड़का,
मारा जाये।
(२) किसी का नाक कान न काटा जाये ।
और ज़ईफ़ न
(३) इबादत करने वाले गोशा नसीन क़त्ल न किये जावें । और उनके इवादत खाने ( पूजा की जगह ) न खोद
जावें ।
(४) कोई दरख्त फलदार न काटा जावे ।
(५) कोई इमारत और आबादी बोरान न की जावे ।
(६) किसी जानवर बकरी ऊंट वगैरह की कूचे न काटी
जावें ।
(७) कोई काम वगैर सलाह और मशवरे के न होवे ।
(८) हर एक के साथ तरीक़ा इन्साफ़ व अदल वर्ता जावे
किसी पर जुल्म व जब न किया जावे।
(६) जो अहदो पैमान गैर मज़हब बालों से किया जावे वह
बेशक वफ़ा किया जावे ।
(१०) जो लोग इताअत क़बूल करें और जिज़िया दें उनके जान और माल मुसलमानों के जान व माल के बराबर समझे
२७
जायें और उनके दुश्मनों से उनकी हिफाज़त की जावे और तमाम मामलों में उनके हुक्म मिस्ल मुसलमानों के समझे जावें ।
(११) जब तक इस्लाम क़बूल करने की दावत न की गई हो । यकायक न लड़ना चाहिये ( देखो तहज़ीबुल अखलाक जिल्द १ नम्बर १ सफा ३० सन् १२५७ हिजरी ।
तीसरा अध्याय तवारीखों से ।
हमारे अन्वेषी पाठकों से यह छिपा न रहे कि इतिहास की खोज से पहिले यह मालूम कर लेना ज़रूरी है कि इसलाम आजकल किन २ देशों में फैला था और कहाँ २ अब मौजूद हैं और किस तरह फैला और किस तरह नाश को प्राप्त हुआ जब तक यह बात प्रगट न हो सम्पूर्ण खोज व्यर्थ है । इस हेतु सब से प्रथम इसकी आलोचना करना उचित है ।
यह बात बिदित ही है क इस्लाम १३०० वर्ष के अन्तगत निम्न लखित देशों में फैला था
इन देशों के सिवाय इस्लाम का पता नहीं मिलता परन्तु इन देशों में से पुटंगाल, स्पैन में सिवाय मसजिदों के पुराने खंडहरों के इस्लाम का नाम निशान नहीं रहा। इन देशों के सम्पूर्ण निवासी अब इसाई होगये हैं ? यद्यपि कई सौ बर्ष मुसलमान ही रहे अब मुहम्मदी मत सर्वथा परित्याग करि दिया इस हेतु, हम इन देशों में से प्रत्येक का वर्णन इतिहासिक आधार पर करते हैं ताकि यह ज्ञात होसके कि वे लोग किस तरह मुसलमान हुए ।
७
ATH
५
२५
नम्बर शुमार
नाम महाद्वीप
नाम देश जिसमें इस्लाम फैला
कैफ़ियत
AKTANT
१ एशिया अरब
२
३
४
26
"
मुहम्मदी आर्यब
मुहम्मदी, यहूदी ईसाई
रूम
फारिस
"”
मुहम्मदी पारसी आय
मुहम्मदी, काफिर आर्य
23
""
अफगा- निस्तान
बिलोचि- बिल्लोची, आर्य
स्तान
हिन्दुस्तान आय मुसलमान, जैनी ईसाई, भोल, गौड़ संताल
AZE
"
स्पैन
अब मुहम्मदी एक भी नहीं रहा सब ईसाई होगये
"
अफरीक मिश्रनेटाल
मुहम्मदी हवशी यहूदी ईसाई आय
मराको
133
"
मुहम्मदी, ईसाई यहूदी-हवशी
- जहाद #
अरब किस तरह मुसलमान हुआ ।
२६
TI.
खुद हज़रत मुहम्मदके ज़माने में अरब वालोंस मुफस्सिल ज़ैल मशहूर लड़ाई हुई हैं। जिनमे हज़ारों लाखों आदमी तल- वार से क़त्ल हुए। सैकड़ों स्त्रियां लौड़ियां बनाई गई । और हजारों ऊंट बकरी लूट गये। हज़ारों के घर तबाह हुए और जब लूट से काफ़ी पूंजी जमा होगई तो फिर इनाम इकराम मिलने लगे । माल मुफ्त दिले वे रहम पर अमल दरामद किया गया जो साथ शरीक होजाता वह गरीब चरवाहोंके हक़ में गोया भेड़िया होजाता था । हम इस मोके पर मुफस्सिल हालात लिखने से पहिले अरव के एक मशहूर और मारूफ आदमी अबू सुफियान के मुसलमान होने का हाल दज करते हैं ।
जब मुहम्मद ने मक्के की फतह करने पर फौज़ तय्यार की तो अव्वास और अनूसुफियान जो निष्पक्ष थे घूमते हुए आपस में मिले | अव्वास ने अबू सुफियान से कहा कि अब सब मारे जाओगे उसने मारे जाने से बचने का उपाय पूंछा । अव्वास उसको इस्लाम में लाने के बहाने निर्भय कर देने का वादा करके मुहम्मद के पास लेगया। हज़रत उमर मारने के वास्ते दौड़े। रात को उसको
उसको हवालात में रक्खा सुबह को हाजिर लाया। मुहम्मद साहब ने कहा कि अबतक वह समय नहीं आया कि तू कहे कि ख़ुदा एक है और उसका कोई साझी नही और उसके सिवाय कोई पूजित नहीं । और मैं सबा नबी (पैराम्यर ) हूं अबू सुफियान ने कहा कि मेरे माँ बाप आपके भक्त हैं। सब बड़ाई और बुजुर्गी आपही की है। उन गुस्ता- स्त्रियों और वे अदवियों के बदले जो मुझसे हुई आप की यह
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कृपा मुझ पर है। वास्तव में एक ख़ुदा के सिवाय कोई पूजित नहीं । परन्तु पैग़म्बरकी सत्यता पर मौन धारण किया अव्वास ने कहाकि पैग़म्बर की सत्यता पर भाषणकर नहीं तो खैर नहीं। अबू सुफियान ने मजबूर होकर पैगम्बर की सच्चाई मानी और इस्लाम गृहण किया। तब अब्बास ने नबी की सेवा में अर्ज किया कि हे अल्लाह के पैग्रम्बर अबूसुफियान पद और मान को अच्छा समझता है । उसको कोई पदाधिकार दीजिये ताकि उसका मान हो । मुहम्मद ने उसको इस आज्ञा से मान दिया कि जो कोई असुफियान के घर में दाखिल हो उसकी जान बशी जावे। निदान वह छुट्टी लेकर मक्के को गया-अब्बास उचित अवसर पाकर पैग्रम्बरको सम्भतिसे अबू सुफियान के पीछे गया, वहडरा अब्वासने कहा डरमत । सारांश यह कि अव्वास ने अवसुफियान को रास्ते के किनारे पर खड़ा किया ताकि सब लश्कर इस्लाम को देखले और उस पर रोब होजावे ताकि वह फिर इस्लाम से न फिरे । जब कि इस्लाम की फौज अबूलुफि- यान के सामने से निकल गई लोगों ने कहा जल्द जा और कुरेश को डर दिलाकर और समझाकर इस्लाम के घेरे में ला ताकि जीवन मौत से निर्भय होजावे अवूसुफियान जल्द उनकी जान मारे जाने से बचा सके, (देखो तारीख अम्बिया सफ़ा ३५४ व ३५५ सन् १२८१ हिजरी और ऐसा ही जिक्र किताब सीरतुल रुस्ल व तफसीर हुसैनी जिल्द १ सूरे तोबा सफ़ा ३६० में है )
जिस क़दर खूं रेजी और लूटमार से अरब के लोग मुसल- मान हुए हैं अगर उनकी मुफस्सिल फिहरिस्त लिखी जावे तो एक दफ्तर बनजावे। हालत पर लक्ष करते हुए संक्षेप से वर्णन करते हैं ।
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(१) ग्रज़बा ( लड़ाई ) वदां । (२) गज़वये ववात । (३) गज़वतुल अशरह (४) गज़बये वदर ऊला । (५) जङ्ग बदर । (६) गज़ब तुल क़दर (७) गज़य तुल अन्सार (८) गज़बा वाजान (६) गज़बा सौवक (१०) गज़बा अहद (११) गज़वा हमराउल असद (१२) गज़बा जातुर्रिका (१३) गज़बा बदरुल मुअद (१४) गज़बा दौमतुल जन्दल (१५) गज़वावनी मुस्तलिक (१६) गज़वा बनी नजीर (१७) ग्रजबे खन्दक (१८) गज़वा वनू तिबियान (१६) गज़वाजूकुरह (२०) गजबा फतह मक्का (२१) गज़बा हवाज़न (२२) गज़बा औतास (२३) गज़बा ताइफ (२४) गज़बा वनीक़ीक़ा (२५) गजबा बनीनुफैर (२६) गज़बा वनी करैता (२७) गज़बे तलूक़ ।
इन २७ मशहूर गज़वाता ( लड़ाइयों) के सिवाय और बहुत से हमले और जन हुए हैं, जिनकी कुल तादाद ८१ के करीब पहुंचती है इस किस्म के सैकड़ों मुकाबिले और लड़ा- इयों के बाद जान के लाले पड़जाने के डरसे डरपोक देहाती मुसलमान बन गये और जोर वाले वहादुर शेर दिल देहाती जैसे अब्बुल हुकम ईश्वरीय कृपापात्र वगैरह शहीद होगये । हिसारे की क़ौम
मुहम्मद से पूछा का जग में लिखा है कि हज़रत अली ने
तक क़त्ल से हाथ न उठाऊं मुहम्मद
ने कहा जब तक यह न कहे कि अल्लाह एक है और
मुहम्मद उसका पैगम्बर है तबतक क़त्ल कर (देखो तारीख अम्विया सफ़ा ३४६ सतर १५ या १६ सन् १८८१ हिजरी )
गज़बा वनी कुरैता की बाबत लिखा है कि साद विन मआज़ ने पैग़म्बर को कहा कि इस वदज़ात क़ौम यहूदी का किस्सा तमाम करो गर्ज कि लड़ने लायक आदमी मारे गये और वाक़ी क़ैद किये गये चुनांचे कई सौ आदमी कुरैती
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मदीने में लाकर क़त्ल किये गये । ( देखो मौलबी नूरुद्दीन साहब की फस्लुल खिताब सफ़ा १५६ )
सुलह फुदक की बावत लिखा है कि नुहेफा बिन मसऊद ख़ुदा की हिदायत के वमूजिब सुलह फुदक तशरीफ ले गये और उस क़ौम को इस्लाम फैलाने का पैगाम देकर जहाद का पैगाम दिया–मगर उन्होंने न सुलह का पैगाम दिया और न लड़ने को बाहर मैदान में निकले। (देखो नारीख अम्बिया सफा ३४७ सन् १२८१ हिजरी )
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मुहम्मद साहब के मरने के बाद जो बहस हज़रत अबू बकर की खिलाफत से पहिले सादविन उवादा बड़े आद- मियों में से था ) सैकड़ों मुसलमानों के सामने को है । उससे सारा हाल अरब के इस्लाम में लाने का जाहिर होता 1 जैसा कि लिखा है सादविन उवादा ने क्रोधातुर होकर कहा कि हे अन्सार का गरोह तुम सब काटी हो कि तुमको इस्लाम के सब गरोहों पर मान है। क्योंकि मुहम्मद अपनी क़ौम वाद दश वर्ष के जियादह रहा । और सबसे मदद चाही और दीन को जाहिर करता रहा मगर सिवाय चन्द आद मियों के किसी ने ध्यान नहीं दिया और कोई उस मुसोबत के समय साथी न हुआ-मगर थोड़े दिन मदीने में रहने से और हमारे कष्ट उठाने से ख़ुदा को यह कृपा हुई कि दोन इस्लाम को वह तरक्की हुई जो तुम देखते हो ।
पस खुलासा बात यह है कि तुम्हारे कष्ट से सिवाय इस के और क्या नतीजा होगा कि अब बड़े २ रईस इस्लाम मुहम्मद में दाखिल हैं। खिलाफ़त के काम और रियासत तुम्हारे क़ब्ज़े में रहनी चाहिये । सब असार ने कहा कि हे साद सच है जो तुमने कहा
तेरे सिवाय अन्सार में कोई
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बड़ा नहीं। हमने तुझको अपना सर्दार बनाया और तुमसे वरैयत ( प्रतिज्ञा ) करते हैं तुझसे ज़ियादह अच्छा खिलाफ़त का काम बजाने वाला कोई नहीं है अगर मुहाजिर (पुजारी) इस बारे में कुछ विरोध करेंगे तो हम उनसे कहेंगे कि अच्छा अमीरी तुम्हारे ही खान्दान में सही और हमारे खान्दान में मी सही । (देखो तारीख अम्विया सफ़ा ३७४ सन् १२६१ हिजरी ) ।
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मुहम्मद साहब ने लोगों से वादा किया था कि कैंसर और किसरा के खजाने बज़रिये गनीमत तुम्हारे हिस्से मे आयेंगे मुसलमान होजाओ । पस लोग इसी नियत से मुसल- मान हुए
थे जैसा कि अक्सर मर्तबा उस समय के मुसलमान इन्कार करते और परेशान होते रहे ( देखो मुफस्सिल तारीख अस्विया सफ़ा ३२४ सन् १२८१ हिजरी । )
गज़वये वदर कुत्रा में साद वगैरह मुसलमानों ने मुहम्मद साहिब को यह राय दी कि तेरे लिये एक सुरक्षित तख़्त की जगह अलग मुक़र्रर कर और ज़रूरी असबाब उसम रखद और फिर काम में लगें। अगर हम जीते तो पाहेली सूरत म अपनी जगह सवार होकर मदोने में जावें। हज़रतन साद की राय पसंद की और भलाई की दुआ दी और नकवत आद- मियों को राय के मुताविक तर्तीबवार अमन करने मे लग गये और आनन फानन में तर्ती की नींव डाली (देखो तारीख अम्विया सफ़ा ३०५ सन् १२८१ हिजरी देहलो)
रानीमत के माल वांटते पर हमेशा झगड़ेही रहते थे और इसी लूट के माल की खातिर पहिले लोग मुसलमान हुए थे और इसी की तर्जीव से मुख्तलिफ़ वक्तों में मुसलमान होते रहे । (देखो सफ़ा ३१० तारीख अम्विया । )
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हिजरी की दोम साल में निरपराधो यहूदियों का माल व असबाब लूटा और उनको मदीने से निकाल दिया । चुनांचि लिखा है कि तमाम माल व असबाब बुरे काम करने वालों का मुसलमानो के हाथ आया और पांचवां हिस्सा कायदे के बमूजिब निकाल कर बाकी बट गया ( देखो सफ़ा ३१२ तारीख अम्विया । )
साल सोयम हिजरी में कावविन अशरफ़ सव उत्तम शायर को सिर्फ कुरेश का शायर होने के कारण हज़रत मुहम्मद साहब ने एक होला सोचकर अनूनामला मुसलिमा वगैरह के हाथों से क़त्ल करवा दिया और पैग्रम्बर पर जान न्योछावर करने वालों ने अबूराफे विन अविल हकीक को वे गुनाह क़त्ल कर डाला। देखो सना २१३ तारीख अम्विया सन् १२८१ हिजरी ।
जंग अहद के जिक्र में लिखा है कि जनाब पैग़म्बर की निगाह व हिफाजत में महाजिर (पुजारी) इन्सार ने बड़ी कोशिश की इस लड़ाई में कुरेशियों ने इत्तिफाक किया था इसमें अक्सर पैग़म्बर के साथी व चार महाजिर (पुजारी) और ६६ अन्सार लड़ाई के मैदान में मारे गये मुहम्मद साहिब गड्ढे में गिर पड़े | पांव में चोट आयी कम्प जारी होगया- बड़ी कठिनता से तलहाने गड्ढे में नीचे उतर कर कान्धे पर चढ़ाया और अली ने आहिस्ता २ हाथ पकड़ कर बाहर को खींचा और जिस वक्त मुहम्मद बाहर निकले तो दुःखित देखा। दांत टूटे हुए पाये जख्मों से खून जारी था आम खबर फैल गई थी कि मुहम्मद साहब मारे गये अमीर हमज़ा वगैरह मारे गये कुरेश की औरतों ने उनके नाक कान काट लिये- सना ३१६ व ३१७ तारीख अम्विया सन् १२८१ हिजरी । )
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अगर ख़ुदा करता कि वह जरासी और हिम्मत करजातीं तो मुहम्मद इस्लाम का नाम व निशान न रहता । मगर अफ़- सोस कि सुस्ती की - बुद्धिमानों ने सच कहा है “कार इमरोज़ व फर्द मफ़गन" ( आज का काम कल पर मत छोड़ो। हज़रत के मरने पर बड़ा विरोध और ईर्षा व झगड़ा सब अरब में फैल गया हर एक गिरोह रियासत चाहता था और दूसरे का बिरोधी (देखो तारीख अम्बिया सफ़ा ३७१ से ३७४ तक )
रिसाले मुअजज़ात में लिखा है कि हज़रन के मरने के बाद अरब के बहुत से क़बील फिर गये । । য
सूरे मायदा :- “या अय्योहलजीना आमनू मई यरतद्दा मिन्कुम अन्दोनही फलौफा यातिल्लाहो विकौमिन हिन्बहुम बयोहिब्बूनह अज़िल्लतुम अलल मोमिनीना अइजनुन अलल काफिरीना उजाहिदूना फो सभी लिल्लाह | "
अर्थ :- हे मुसलमानों जो तुम अपने दीन से फिर गये एक कौम अल्लाह की तरफ़ से करीब आवेगी कि तुम उनको दोस्त रक्खोगे और वह काफिरों पर जहाद करेंगे अल्लाह के लिये ।
M
और अबूउबैदा सही किताबों में लिखता है कि जिस वक मोहम्मद के मौत की खबर मक में पहुँची अक्सर मक्का के लोगों ने चाहा कि मुहम्मदी इस्लाम से अलग होजायें चुनांचि मक्का के अमलावाले कई दिनों तक डर के मारे घर से बाहर नहीं निकले मुहम्मद के मरने पर जो लोग इस्लाम से फिर गये वह भी तलवार से जीते गये । अन्त में फिसाद बढ़ते बढ़ते यहां तक नौबत पहुँचो कि ‘अली खलोफा के वक्त में तलहा और जुवैर और आयशा मुहम्मद साहिब की बीबी और माविया का शाम के मुल्क की तरफ हज़रत अली और दूसरे मुसल - मानों के साथ लड़ाई हुई बीबी आइशा ने तलहा के बढ़ावे की
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- जहाद
सलाह और मुहब्बत से लड़ाई की। शाम के सर मुसलमान अली के मारने पर तय्यार थे जिसमें हज़रत अली मय एक लाख साठ हज़ार फौज के और हज़रत माविया वगैरह भी मय बहुत सी फौज के फरात नदी के किनारे पर लड़ाई लड़ने आये ६ माह लड़ाई होती रही ७०००० आदमी अली के तरफ़ के और १२०००० माविया की तरफ़ से मुसलमान हताहत हुए। माविया ने सुलह (सन्धि ) का पैग़ाम भेजा - अलीने अस्वी- कार किया लड़ाई हुई इसमें ३६००० और भी मारे गये अन्त में २२००० मुसलमानों के मारे जाने के बाद सुलह हुई । इज्न मुलहम मिश्र के रहनेवाले मोमिन ( ईमानवाले ) ने बड़े प्रेम से एक औरत के निकाह के बदले अलो को मारडाला । उस कुतामा नाम ईमानदार औरत ने अपने मिहर में अली का क़त्ल लिखवाया था | इस तरह अरब में इस्लाम बढ़ा और घट गया (देखो तारीख अम्विया सफ़ा ४४५ व ४४६ सन् १८८१ हिज्र देहली । )
यह माविया अली के जङ्ग की अग्नि बहुत काल तक प्रज्वलित रही और इसी का अन्तिम परिणाम यह था कि अली के लड़कों हमैन व हुसैन का यजीद माविया के लड़के के साथ इमाम होने का झगड़ा हुआ और असंख्य मुसलमान दोनों तरफ के कल हुए ( देखो जंगनामा हामिद । )
जो लोग मुसलमान होते थे उनको माल व संतान वापिस मिलता था । क़त्ल से बच जाते थे इस वास्ते अक्सर क़बीला अरब जब लड़ते लड़ते और खून की नदियां बहाते बहाते तक आगये मज़बूरन मुसलमान होगये चुनांचि गज़वा तायफ में लिखा है बाद फतह के एक गिरोह हवाज़न (हवा उड़ाने वालों ) ने इस्लाभ क़बूल किया और आपने उनकी जायदाद
तङ्ग
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और संतान को वापिस दिया फिर मालिक विन अताफ़ जो हुनैन के काफ़िरों की फ़ौज का सर्दार था विवश होकर मुसलमान हुआ और इसका माल व संतान वापिस दोगई । (देखो तारीख अम्विया सफ़ा ३६० सन् १२८१ हिज्री )
नवीं साल के जिक्र मे लिखा है कि गिरोह गिरोह अरव के कबीले शौकत व इस्लाम की तरक्की देखकर मुसल- मान होगये यहां तक कि नाम इस साल का “सनतुल वफूद वफादारी का साल कहते हैं ( देखो सफ़ा ३६१ तारीख अम्विया १२८१ हिजरी )
फिर लिखा है कि मुसलमानों को जीत पर जीत होने से आस पास के मुशरिक लांग दिक्कतें व परेशानी उठाने के बाद इस्लाम को शरणागत हुए और काफ़िरयन भूल गये । ( तारीख अम्बिया सफ़ा ३८६ व ३६० )
अरब में गुलामी का आम दस्तूर अघ तक मौजूद है । और वह हज़रत के वक्त से जारी है। लॉडी
से जारी है। लॉडी और गुलाम जिस तरह मक्का में भेजे जाते हैं और ख्वाजा सराय बनाये जाते हैं और मक्का मौजमा और मदीना मनम्वर बल्कि रोज़ह मुतहरह पर व्वाजा सरायों का यक़ीन है । निहायत अफ़सोस के काबिल है और फिर कहा जाता है कि दीन इस्लाम में जबर करना जायज़ नहीं ।
एक योग्य और प्रतिठित इतिहास लेखक लिखता है कि अरब वाले नूह को संतान नहीं हैं बल्कि कृष्ण लड़के शाम की संतान में से हैं और इस वास्ते वह शामी कहलाते हैं द्वारिका से खारिज हो जाने के बाद शाम जी अरब मय अपने सम्बन्धियों व सेवकों के आगये और उसी रोज़ से अरब आबाद हुआ वर्ना इससे पहिले वहां आबादी नहीं थी और ३५
अरब शब्द संस्कृत का है (यानी आर्यावः ) यानी आय का रास्ता मुल्क मिश्र को आर्यों की यात्रा का रास्ता औरअरब का अंगरेज़ी नाम अरेविया को देखने से यह बात समझ में आजाती है। पस दरहक़ीक़त अरब के लोग शाम जी कृष्ण के बेटे की संतान में हैं ।
रूम किस तरह मुसलमान हुआ
जिस तरह हमने अरब का वर्णन विश्वासनीय इतिहास की साक्षी से सिद्ध किया है कि वह किस जोर ज़ुल्म से मज़बूर होकर मुसलमान हुआ और किस कदर लूट धसूट से दीन मुहम्मदी किस ग्ररज स
फैलाया गया। वही हाल रूम व शाम का है। चुनांचि इसका खुलासा हाल फतूह शाम में दर्ज है और दरहक़ीक़त वह देखने के लायक़ और दीन इस्लाम की क़दर जानने के लिये उम्दह किताब है ।
मुआज़विनजवल ने जो उवेदह की तरफ़ से दूत बनकर आया था वतारका हाकिम रूम से कहा कि या तो ईमान लाओ क़ुरान पर मुहम्मद पर या हमें जिज़िया दो नहीं तो इस झगड़े का फैसला तलवार करेगी होशियार रहो ( देखो तारीख अम्विया सफ़ा ४१३ सन् १२८५१ हिजरी )
अवू उवैदाने जो अर्जी मोमिनोंके अमीरउमरको लिखीउसमे लिखा था कि इसलाम की फौज हर तरफ़ को भेज दीगई है कि जाओ जो जो इस्लाम क़बूल करै उनको अमन दो और जो इस्लाम क़बूल न करें उन्हें तलवार से क़त्ल करदो । (सफ़ा ४०१ तारीख अम्विया सन् १२८१ हिजरी ) ।
हज़रत अबू वक्र ने उसामा को सिपहसलार मुक़र्रर करके लश्कर को जहाद के वास्ते शाम के देश में भेजा। उसने वहां
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जाकर उनके खण्ड भण्ड कर दिये और तमाम काफ़िरों की नाक में दम कर दी जो घबराकर अपने देश को छोड़कर भाग गये। और मारता डाटता वहां तक जा पहुंचा हवाली के लोगों से बदला लिया और फिर बहुत सा माल लेकर दबलीफ़ा रसूल की खिदमत में हाजिर हुआ। उस वक्त लड़ने वालों की कमर टूट गयी क्योंकि उन नादानों का गुमान था कि अब इस्लाम में बन्दोबस्त न रहेगा और इस क़दर ताक़त न होगी कि जहाद कर सकें। ( देखो तारीख अम्विया सफ़ा ३७६ व ३७७ सन् १२८१ हिजरी )
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शाम की जीत के लिये जो पत्र हज़रत अबू वक्र सद्दीक़ ने जहाद की हिज़रत ( तीर्थयात्रा ) के वास्ते मुअज्जम ( बड़े ) मक्का के लोगों के लिये उसमें लिखा है कि कर्बला और शाम के दुश्मनों (देखो सफ़ा १३ जिल्द ९ फतूह शाम मतबूआ नवलकिशोर सन् १२८६ हिजरी )
फिर वही इतिहास वेत्ता लूट का माल हाथों हाथ आने का वर्णन करके लिखता है कि यज़ीद लड़का सुफियाना का और स्वैया अमिर का लड़का जो इस लश्कर के, सर्दार थे कहा कि मुनासिव है कि सब माल जो रूमियों से हाथ लगा है हजरत सहीक़ के हुजूर में भेजा जावे ताकि मुसलमान उस को देखकर रूमियों के जहाद का इरादा करें। ( फतूह शाम जिल्द १३ सन् १२८६ हिजरी )
हज़रत अबू वक्र सदीक़ शाम के जाने के वक्त यह वसी यत उमेर आस के लड़के को करते थे कि डरते रहो खुदा से और उसकी राह में लड़ो और काफ़िरों को क़त्ल करो । ( जिल्द अव्वल फतूह शाम सफ़ा १६ )
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शाम को एक लड़ाई में ६१० कैदी पकड़े आये । उमरविन आस ने उन पर इस्लाम का दीन पेश किया पस कोई उनमें का मुसलमान न हुआ फिर हुक्म हुआ कि उनकी गर्दनें मार दी जायें ( जिल्द अव्वल फतूह शाम सफ़ा २५ नवलकिशोर ) दमिश्क के मुहासिरे की लड़ाई में लिखा है । फिर खालिदविन वलीद ने कलूजिस और इज़राइल को अपने सामने बुलाकर उन पर इस्लाम होने को कहा मगर उन्होंने इन्कार किया पस वमूजिब हुक्म वलीद के बेटे खालिद और अजूर के लड़के ज़रार ने इज़राइल को और राधा विन अमर- ताई ने कलूजिस को क़त्ल किया (देखो फतूह शाम जिल्द अव्वल सफ़ा ५३ नवलकिशोर )
किताब फाजमाना तुक हिस्सा अञ्चल जो देहली से कृपा उसमें लिखा है कि तीन सौ साल तक तुसलमान रूम के हुक्म से हर साल १००० ईसाइयों के बच्चों को क़त्ल करने वालीफोज में जबन भर्ती करके मुसलमान किया जाता था और उनको ईसाइयों के क़त्ल और जन पर आमादह किया जाता था सिर्फ यहां तक ही संतोष नहीं किया जाता था बल्कि ईसाइयों के निहायत खूबसूरत हजारों बच्चे हरसाल ग्रिलमां बनाये जाते और उनसे रूमी मुसलमान दीन वाले प्रकृति के विरुद्ध ( इगलाम - लौंडेबाजी ) काम के दोषी होते थे । और जवान होकर उन्हीं गाज़ियों के गिरोह में शामिल किये जाते थे कि वहिश्त के वारिस हों । अलमुख़्तसिर मुफस्सिल देखो असल किताब | )
जिस तरह खलीफ़ों के वक्त में जबरन गिरजे गिराये जाते व बर्बाद किये जाते थे इसी तरह शाह रूम ने भी
जल्म सितम से गिरजाओं को मसजिद बना दिया ।
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फारिस ईरान किस तरह मुसलमान हुआ इसका हाल रोज़उससफ़ा जिल्द दोम व किताब सन- दुल तवारीख में लिखा है जिसका खुलासा
जिसका खुलासा यह है कि उमर ने खलीफ़ा होने के बाद अरब की फौज को यह हुक्म देकर ईरान भेजा कि अगर उस मुल्क के लोग खुशी खुशी मुसलमानी मत क़बूल करें तो अच्छा, नहीं तो उन पर आघात करके और कल करके उन्हें जमन करान और मुहम्मद के तांबे करो। जब कि ईरानियों ने दीन इस्लाम क़बूल करने से इन्कार किया तो अरब के लश्कर ने लड़ाई शुरू करके तीनवार ईरान की सिवाह से शिकस्त ( हाट ) खाई। मगर चौथीवार उन पर विजयी होकर फांत नदी के आस पास के देशों पर दखल किया। इसके बाद दशहर यार का बेटा यज़ जजू खुसरो परवेज के नवासे जो सासांनियां बादशाहों में से अमानी बादशाह था। ईरान के तख्त पर बैठा । इस वक्त सादविन वकास ने जो अरब के लश्कर का सर्दार था ( गोया ) ईरा - नियों को मुहम्मदां बनाने का ठेकेदार था ) यज़ जज़ू के पास दूत भेजा ताकि उससे दीन मुहम्मदी कबूल करावे और अगर वह कबूल न करें तो लड़ाई करें। लेकिन यज्ञ ज ने उसकी बात न मानो बल्कि गुस्सा होकर लड़ाईकी तय्यारी का हुक्म दिया और बहुत सी फौज जमा करके मुकाबिला किया | यह मैदान जङ्ग मुकाम कावासियह पर हुआ - जब फरीकैन के मुकाविले के बाद ईरान की फौज ने हार खाईं । तो कादियानी दिरफस अयौंके हाथ पड़ा और फिर २१६ साल हिजरी में शहर हम्दां के पास निहदन्द के मैदान में लश्कर अरब ने ईरान की फौज को दुबारा शिकस्त देकर सब ईरान पर कब्जा कर लिया । और यजू जजू भागकर मव के पास
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एक आसियान के हाथ ईरान खलीफ़ा की ओर
ले मारे गये और इसी तरह तमाम हुकूमत में आगया । और दो सौ अर्वों ने उस मुल्क में हुकूमत की। अक्सर ईरानियों ने खलोफ़ा और उनके डर से मोहम्मदी मज़हब क़बूल किया और जिन्होंने क़बूल न किया वे अब के हाथों से क़ल हुए, या देश से निकल कर बिलूचिस्तान, अफगानिस्तान हिन्दुस्तान की तरफ़ ‘भाग गये–चुनांचि इनकी नसल]अब तक इन मुल्कों में बाकी है और जो गवर कहलाते हैं ।
खुलासा सबका यह है कि ईरानियों ने खदा न वास्ता कुछ इस सबब से दीन मुहम्मदी कबूल नहीं किया कि इस तरीक़ में तालोम पाकर और क़रान के मतलब और यानी समझकर या सोचकर मालूम किया हो कि क़रान जबरदस्ती मजहब पर ग़ालिब है बल्कि यह बात सिर्फ अरब को फौज के ज़ोर जुल्म से ज़हर में आई ( अज़ तरीकुल हयात फस्ल २ सफा ७० )
अर्बी ज़वान के मशहूर मारूफ़ फाजिल डाक्टर लाइटनर साहिब फर्माते हैं | हज़रत उमर सन् ६३४ में खलोफ़ा हुए और नौशेरखां के दरवान को खराब किया और किताब खानून को जलाया, पानी डुबोया और यही हाल सिकंदरिया का किया (देखो सनीउल इसलाम हिस्सा अव्वल सफा ३० सन् १८८० ई० ) फिर वही डाक्टर लाइटनर साहब बहादुर फर्माते हैं, उमर की खूनभरो तलवारने सारी ईरानको मुसलमान किया- जो बच सके वह ग्ररीवुल वतन होकर अफ़गानिस्तान विलोचिस्तान, हिन्दुस्तान में आगये । जो अब तक मौजूद हैं । (देखो सनीनुल इंसलाम हिस्सा अव्वल ) फिर एक लायक इतिहास लेखक मौलवी ज़काउल्ला साहब फर्माते हैं पारसी
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R
बम्बई में कसरत से रहते है उनके यहां आवाद होने का सबब यह है कि सातवीं सदी में जब ईरान में अहले इस लाम का वसना हुआ और सासानिओं का खान्दान का ज़वाल हुआ तो यह खौफ़ के मारे इधर उधर भाग आये वह अपने ही रस्म व आईन के पावन्द व दस्तूर चले जाते हैं। (देखो तारीख हिन्द हिस्सा अव्वल फस्ल दोयम सफा ८) फिर एक तारीख में जो वलिहाज़ तहकीक़ात के बहुत जियादह विश्वासनीय है लिखा है । खलीफा उमर ने ईरान की निय मितों को सब लश्कर वालों को याद दिलाकर कहा कि यह नियामत और लूटका माल हाथ न आयेगा जब तक सफ़र को घर में रहने के ऊपर और मिहनत को आराम के ऊपर मुक़द्दम न समझोगे । मुनासिब है कि तुम सुभीतों को जारी
। है। रक्खो | और लड़ाइयों के मुरादों को हासिल करने में लाजिम समझो । चुनांचे अबू उवैदा सिपहसालार ( सेनापति ) करके एक वही फौज ईरान को फतह करने के लिये भेजी ( देखो तारीख अम्बिया सफ़ा ४११ ) जापान नाम एक बहादुर ईरानी जब मुकाबिले में गिरा और मन्जर उसका सिर काटने लगा तब उसने डर के मारे कलमा पढ़ा कि मैं मुसलमान हूं चुनांचि वह इस्लाम वालों में दाखिल हुआ और बड़ा दर्जा पाया देखो तारीख अम्बिया सफ़ा ४१२ यज़ जज़ वादशाह ईरान की शिकस्त का हाल लिखते हुए एक मुसलमान इतिहास लेखक लिखता है कि यजू ज़ुज़ू को फौज के सर्दार को जो उसवक्त सेनापति था एक बदमाश ज्योतिरी ने भटका दिया जिससे वह डरपोक होगया और यही बात अर्वों की फतह का कारण हुई ( देखो तारीख अम्विया सफ्ना ४१८ )
मिश्र मराको वगैरह किस तरह मुसलमान हुए ।
अर्बी के फाजिल और अरब के इतिहास के ज्ञाता लाइटनर साहब फर्माते हैं हज़रत उमर को खिलाफत के सन् ६२५ ई० मैं अक्कूबक, उमर इब्न असाने मिश्र पर हमला किया। शहर सिकन्दरिया फतह हुआ और लूटा गया - पुस्तकालय वहां का घास की तरह जलाया गया - इस जगह पहिला पुस्तका- लय जो बादशाहान टोलोमोनरने मुरत्तिव किया था - वह तो आगे ही कैसर रूम के हुक्म से जलाया गया था। उसके बाद यह पुस्तकालय तय्यार हुआ था वह हज़रत उमर के हुक्म से जलाया गया था ( देखो सनीनुइसलाम हिस्सा दोयम सन् १८७६ ई० सफ़ा ८२) ।
सुहम्मद साहब के एक खत में जोवनाम मक्कस विनराईल हाकिम और बादशाह मित्र और स्कन्दरिया के लिखा गया था यह इबारत है। खुदाने मुझे हुक्म किया है डराने और लड़ाई काफिरों से लड़ने का यहां तक कि डराव वह लोग मेरे दीन मैं और मेरे मज़हब में दाखिल हो ( देखो फतह उलमिश्र मतबूप नवलकिशोर सन् १२८६ हिजरी सफा ४२४ व ४२५ )
फिर लिखा है कि हदीस में पैग़म्बर फरमाते हैं कि लड़ाई मैं धोखे बाजा से मदद मिलती है (देखो फतहउल मिश्र सफा ४२५ नवलकिशोर सन् १२८६ हिजरी ) ।
उमर बिन आसने मिश्र के बादशाह के सामने बयान किया कि अल्लाह ताला ने हमारी मदद की तलवारों के सबबसे और इसी तलवार के सबब से हमने मुशरिकों की ज़लील किया देखो फतुहुल मिश्र सन् १२८६ हिजरी सफ़ा ४४५ ) ।
सैकड़ों मिश्र के रहनेवाले निर अपराध सोये हुए कत्ल किये गये । और कुछ उनमें से कैद कर लिये गये । उनके
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सम्बन्ध में लिखा है । कि कैद करने के बाद उनसे इस्लाम करने को कहा गया। मगर सबों ने इन्कार किया-पस उनकी गर्दन काट दोई ( देखो तारीख फतहउल मिश्र सफा ४६३ व ४६४ ) ।
पुलांस क़स ईसाई पर इस्लाम अर्ज किया पस इन्कार किया और कहा कि मैं शाम से मिश्र में भागा -पस मुझको मसोह ने तुम्हारे हाथों में डाल किया- इस बात में मुझ शक नहीं है कि मसोह मुस्लिम हैं और मैं काफिर हूं - तुम्हारे दीन के साथ -पस खालिद ने उसकी गरदन मारदो ( देखो फतह उल मिश्र सन् १२८ः हिजरी सफ़ा ४६७ ) ।
तेरह सौ मर्द कैद किये गये जिनमें से हुक्म हुआ कि जो इस्लाम कुबूल करे उसे रिहाई दो वर्ना सब को मार डालो चुनांचि खालिदने उन पर इस्लाम अर्ज किया -पस इन्कार की बहुतों ने और जिसने इस्लाम कबूल किया खालिद ने उसको छोड़ दिया और उसके साथ नेकी की। और जिसने इस्कान इन्कार किया खालिद ने उसकी गर्दन मारने का हुक्म किया ( फतह उ मिश्र सफा ४६५ सन् १२६ हिजरी )
इस तारीख में बहुत जगह लिखा है कि जब इस तरह क़त्ल शुरू किया और लोगों की जोरू लड़की वगैरह छीनने लगे तो क़त्ल के डर से बच जाने की आशा से हज़ारों लोग सुसलमान हो गये ( मुफस्सिल देखो सफा ४८२ और ५१२ फतहउल मिश्र )
और अगर कोई मुफस्सिल हाल मुहम्मदी फौज के सेना पतियों की मक्कारी फरेब, दरोगगोई का देखना चाहे तो देखे । ( फतहउल मिश्र के सफ़ा ४२६, ४२७ व ४६४ व ४६६ व ४७० व ४७१ )
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बिलूचिस्तान किस तरह मुसलमान हुआ ।
महमूद सन् ६६६ ई० में तख्तपर बैठा और सन् १०२६ ई० में मरगया मुताबिक ४२० हिजरी के-
व ताईद राय कर्नल टाट साहब के कुछ संदेह नहीं बलूचिस्तान के अक्सर फिर्के उन जादवों की संतान में हैं जो अमरिका की आपस की लड़ाई के बाद सिन्धु पार चले गये गोत बिल्लूचियों का समझ कहलाता है । इस गोत होने का कारण क़यास किया गया है कि जब यह लोग हिन्दू आर्या थे तो श्रीकृष्ण के बेटे शाम की संतान होने से सामी कहलाते थे या सामजा ( शाम से उप्तन्न ) कहलाते थे या खुद श्रीकृष्ण के गोत्र में होने की वजह से यह गोत्र मशहूर हुआ क्योंकि श्रीकृष्णजी का एक नाम श्याम या साम भी है- (देखो तारीख बुलन्द शहर मतबुआ सन् १८७६ ई० सफा ३८५ व ३८७ )
अफगानिस्तान किस तरह मुसलमान हुआ
अगर्चि इसका बिस्तृत वर्णन किसी एक इतिहास में हमको नहीं मिला मगर जितना मौजूदह तारीखों से पता मिलसका वह हम पाठकों की भेंट करते हैं।
पस साफ़ ज़ाहिर है कि यह लोग भी क़ुरान को सही जान कर मुहम्मद साहिब को नबी मानकर मुसलमान नहीं बल्कि हुए तलवार के जोर से मुसलमान बनाये गये ।
● माम् रसीदने जब इस देश में चढ़ाई की जो सन् ८१२ ई० का जिक्र है। उसकी बाबत मौलबी मुहम्मद सिबली साहब प्रोफेसर मोहामेदेन कालेज फर्माते हैं कि मामू ने लश्कर जदीद इस मुल्क की हिफ़ाजत के वास्ते भेजा चुनांचि उसी
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लश्कर जदीद के डर से तबाह होने के मुकाबिले में काबुल का राजा मुसलमान हुआ ( मुफस्सिल देखो हीरो आफ़ इस्लाम जिल्द दोम )
और इस गिरोह का एक और हाकिम भी उसकी तल-
वार के डर से मुसलमान हुआ और उसकी मूर्ति मक्का में सफ़ा और म के दर्मियान डलवाई गयी । देखो हीरो आफ इस्लाम | )
आनरेविल इनफिस्टन साहब
साहब भूतपूर्व
भूतपूर्व गवर्नर बम्बई फर्माते हैं कि जादों की क़ौम सिन्धु के पार कृष्ण के मरने के बाद जा रही थी । ( हिन्दुस्तान को
मेंरीख से ) ।
अफ़ागन, लफ्ज़ ही अस्ल में संस्कृत का है । अफगान यानी बेकायदा है राग जिनका या जो क़ौम गान विद्या से वहिष्कृत हैं और इस बात में ज़ियादह टीका टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं ।
इसके अतिरिक्त अभी तक अफ़गानिस्तान में हजारों जगह उनके पहिले मज़हब की निशानियां मौजूद हैं। सवात और बूनेर के पहाड़ों की ग्रारों में कई तरह की मूर्ते निकली हैं जो सबकी सब हिन्दुओं के देवताओं के चित्रों से मिलती हैं काबुल से कई मील इस तरफ़ बुतखाक वगैरह मुकाम हैं और ऐसेही तस्तवाही और जमात गढ़ी में भी हिन्दू मज़हब के हजारों निशान अभी मौजूद हैं और उनके लिबास भी पुराने आर्यों से मिलते हैं-वे तअस्सुब तारीख लेखकों ने जहां तक पठानों की बाबत जांच करके सही नतीजे निकाले हैं वह तमाम हमारे व्यान के समर्थक और हमारी मर्जी के बमूजिब हैं - महाभारत के समय से राजा भोज के जमाने तक हिन्दू
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और उनका धर्म एक था चुनांचि कर्नेल टाट साहब बहुत विश्वास से जदुवंशियों के सम्बन्ध में लिखते हैं कि अफ़सान की क़ौम वास्तव में यहूदी न थे-यादव थे | इस बहस को करनैल साहब ने बहुत योग्यता के साथ लिखकर साबित किया है कि उनका यहूदी होना बिल्कुल ग़लत है उनकी राय और तहकीकात की मुताबिक़त इस क्रौम की रिवाजों से बखूबी होती है। प्रसिद्ध है कि द्वारिका से खारिज होने के बाद कृष्ण की संतान ने सिन्ध नदी के दोनों तरफ़ चन्द नयी नयी रियासतें क़ायम कीं और उन्हीं जादों के राजा गज बहेरा के मालिक ने अपना राज्य पश्चिम की तरफ़ बढ़ाया और क़िला गज़नी जो अवगज़नो लिखा जाता है बनवाया था- एक दफ़ा रूम व खुरासान के बादशाहों ने मिलकर गज़नी पर हमला किया। उस लड़ाई में राजा गज मारा गया। लेकिन उसका बेटा सालिवाहन बचकर पंजाब का चला आया और उसने पंजाब में सलियानपुर या सलवां कोट जिसे अब स्यालकोट कहते हैं आबाद किया और चन्द साल के बाद फिर गजनी पर दखल कर लिया। चुनांचि अरब से मुसलमानों के आने तक उसी के वारिस अफ़गानिस्तान में हुक्मरानी करते रहे । कहते हैं कि मुग़लों की जाति चुग़ता लेने आई उस समय चुगतामियों का मालिक सालिवाहन था आठवीं या नवीं शताब्दी में जादो पंजाब से निकाले गये तब उन्होंने लक्खी जंगल में शरणागत प्राप्त कर अव्वल शहर तन्नूत फिर दोरवाल फिर जैसामीर उसी जङ्गल में बसाये । पतन के दिनों में बहुतेरे जादव जाट कहलाये बल्कि होगये और बहुतेरे और कौमों में मिल गये जो खालिस रहे वह भी जादव कहलाने लगे ( तारीख राजस्थान में हालात जैसलमीर । )
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चन्द साल हुए जब कि अंगरेज़ों की फौज़ की चढ़ाई सताना पर हुई थी । उन्हीं दिनों में कर्नेल टाट साहब की सम्मति की पुष्टि में खोज हुई थी कि इलाक़ा यूसफ़जाई में पठानों की एक क़ौम अब तक जहों (जादो) कहलाती और उसकी पुरानी रीतों का खुलासा यह है कि असल में जादब थे कि किसी ज़माने में गुजरात से आकर यहां आबाद हुए ( तारीफ़ बुलंद शहर सफ़ा ३२१ व ३२२ ।
नोट - सम्बाददाता को कई वर्ष तक वक्त मुलाज़िमत
व सरकारी पठानों के दर्मियान रहना पड़ा ! वर्षों की जांच से भी ज़ाहिर हुआ कि वह लोग असल में जादंव थे यूसुफ़जाई के इलाके से और इलाका है और उस पता का नाम जहों या गहों हैं और सिर्फ यही नहीं बल्कि वहां के देहात और मुकामों के नाम अब तक संस्कृत और आर्य भाषा के मालूम होते हैं- जैसे रानीघाट, काठलग, सवात, बूनेरिया, भूनेर, तीराह यमरूद या जमरूद मिहमन्द या महामन्द चित्राल, किला सीताराम । पेशावर के इलाके का अस्ल नाम कस्बा बिलग्राम ओडीग्राम बदबीर मेहतरा उत्तम अविलाश या औतमावला खटक या खतक या खटका गढ़ी, गूजर गढ़ी वगैरह हैं । पस दर हकीक़त पठानजादों यादोंके खान्दान से हैं और काफिरस्तान से जो काबुल काश्मीर चित्राल ताहार के दर्मियान सैकड़ों मीलका मुल्क है। अब वहाँ जादोवंशी लोग रहते हैं । पस यह सब लोग जबरन मुसलमान होकर अपने सत धर्म से हटाकर मुहम्मदी बनाये गये जादो से जाट कहलाने का यह सबब मालूम होता है कि जादो जो राजपूत थे खेतीवारी शुरू की और आवारहगर्दी और विद्या के न पढ़ने के कारण असलियत भूल गये । और आवर्त और आर्या
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वर्त की भाषाओं के अन्दर बदल होता है और फ़ारसी में भी। संस्कृत की जाति का ज़ाद, जात बन जाता है पस बाज सरहद्दी मुल्कों में जहां जादों के थोड़े घर हुए और जाटों के जियादह तो जादों से जातो और जाटो बना और बहुत जल्द जाट होगया ।
इसके सिवाय हमारी राय में जाट की क़ौम असल में जादों हैं। असल में यह शब्द यादव था यादव से जादो बना जैसे आर्या से आज फिर बाद इसके अपभ्रंश जाद और जात होकर जाट होगया और इन्हीं ! लोगों ने जजीरह जटलैन्ड वगैरह बसाये - अक्सर मुकामों पर इसी जादौ क़ौम के निशान मिलते हैं ।
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हिन्दुस्तान किस तरह मुसलमान हुआ ।
मौलवी ज़काउल्ला प्रोफेसर फरमाते हैं । यह असली मुसलमान कुल मुसलमानों से जो इसमुल्क में आबाद हैं आधे होंगे । वाकी आधे ऐसेही मुसलमान हैं जो हिन्दुओं से मुसल- मान हुए हैं। सर्कारी मर्दुमशुमारी से मालूम होता है कि हिन्दुस्तान में 8 करोड़ १० लाख मुसलमान रहते हैं । उनमें से जियादह मुसलमान जो हिन्दुओं से मुसलमान हुए हैं । गो इस्लाम ने उनके सिद्धांतों को बदल दिया मगर उनके रस्म रिवाज को न बदल सका । गोकि वह आपस में मिलकर खाने पीने लगे मगर शादी व्याह में अब तक गोत वचाते हैं । खाने पीने में भी अंगरेजों के साथ ऐसा परहेज़ करते हैं जैसे हिन्दू- - गरज इस्लाम का असर हिन्दुओं पर ऐसा नहीं हुआ जैसाकि हिन्दुओं का असर इस्लाम पर हुआ । (देखो तारीख हिन्द हिस्सा अव्वल फस्ल दोम सफ़ा ६ )
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अब हम बतलाते है कि इतने जो मुसलमान है। किस तरह मुसलमान हुए हैं और कब से हुए हैं और सब से पहिला मुसलमान इस मुल्क में कौन हुआ है ।
मुल्क हिन्दुस्तान में सबसे अव्वल मुसलमान वापा राजपूत चित्तोड़ के मालिक ने सन् ८१२ ई० में खमात के हाकिस सलीम की लड़की से शादी कर ली और मुसलमान हुआ मगर मुसलमान होकर लज्जित होकर खुरासान चला गया–फिर न आया उसका हिन्दू बेटा गद्दी पर बैठा । (देखो आईन तारीख नुमा सफ़ा सन् १८८९ ई० । )
सन् ८१२ ई० में खलीफा मामू रसीद ने बड़ी फौज के साथ हिन्दुस्तान पर चढ़ाई की। बापा का पोता उस वक्त चित्तोड़ का हाकिम था - नाम उसका राजा कहमान था । उससे और मामू से जो बीस लड़ाइयां हुई लेकिन आखिर - कार मामू शिकिस्त खाकर हिन्दुस्तानसे भाग गया। ( सफ़ा ६ आईना तारीख नुमा सन् १८८९ ई० और देखो मिफताहुद तवारीख सफ़ा ७ सन् १८८३ तवये सालिस हिस्सा अव्वल )
हिन्दुस्तान का दूसरा मुसलमान राजा सुखपाल नाम महमूद के हाथ राज्य के लालच से मुसलमान हुआ । मगर लिखा है जब महमूद बलख्ख की तरफ़ गया तो उसने फिर हिन्दू वनकर उसकी तावेदारी की। महमूद ने सन् १००६ ई० में उसे पकड़कर जन्म भर के लिये क़ैद कर दिया ( सफ़ा १६ आईने तारीख नुमा सन् १८८९ ई० और मुकताहुद तवारीख सना ३ सन् १८८३ ई० हिस्सा अव्वल )
अब हम महमूद के आने का कारण बतलाते हैं ।
लेथरज साहब फर्माते हैं कि महमूद का हिन्द की दौलत पर तो दांत था ही । मगर साथही यह भी इच्छा हैं कि
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बड़े २ बांके राजपूतों को तलवार के ज़ोर से इस्लामी दीन में शामिल करें और उसका ज़ियादह तर सबब यह हुआ कि बग़दाद के खलीफा ने उसके मज़हबी जोश को देखकर एक क़ीमती पोशाक उसके पास भेजी और अमीनुल मिल्लत और अमीनुल दौलत का खिताब दिया था-पस महमूद ने यह प्रतिज्ञा करली थी कि दीन इस्लामके फैलानेके लिये हरसाल हिन्दुस्तान पर हमला करेगा (देखो मुख्तसर तवारीख हिन्द सन् १८८७ ई० लाहौर सफ़ा ४८ और तारीख हिन्दुस्तान सफ़ा ८६) फिर लिखा है दूसरे मज़हब वालों को ज़बरदस्ती मुलस- मान बना लेना यह उस मज़हब वालों के नज़दीक उन दिनों नाम पैदा करने के लिये ऐसी एक बड़ी बात थी कि महमूद सा हौसलेदार इस अजीब वे नज़ीरमुल्कको छोड़कर कब किसी दूसरे मुल्कपर दिल चलाता । भला अमृत फल छोड़ कब इन्द्रा- यन खाता । (सफ़ा ८ आईने तवारीख नुमा सन् १८८१ ई० ) तारीख बम्बे में लिखा है “ महमूद ने गंगा के किनारे दश हज़ार के करीब मन्दिर तोड़े और अपने सिपाहियों को लूटने और कैदी लेने की इजाज़त दो। जिसने जिधर राह पायी भाग गये सब बिधवा और अनाथों की तरह परेशान हुए जो निकल कर न जासके । कैद किये गये सफ़ा १० आईने तारीख नुमा सन् १८८१ ई० )
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फिर लिखा है सन् १००० ई में यह भूले हिन्दुओं पर जहाद किया और बारह दफे हिन्दुस्तान पर आया - ( तवारीख हिन्दुतान सफ़ा १८ ) ।
फिर लिखा है महमूद की ग्ररज़ इन हमलों में जहाद करने और मुल्क की दौलत लूटने से थी- ( सफ़ा ८ मिफ़ताउत तवारीख सन् १८८२ ई० )
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मथुरा के शहर में शाह महमूद तलवार पकड़कर घुसगवा और सब मूर्तियों को तोड़ डाला-चांदी और सोने को गला डाला (तारीख हिन्दुस्तान सफ़ा ८२ )
महमूद रास्ते में मथुरा को तख्ता तबाह करता गया-बीस दिन तक उसे लूटा और मूर्ती को तुड़वा के मन्दिरों में बुरा २ काम किया । १०० ऊंट निरी तोड़ी हुई चांदी की मूर्ती से भर कर ले गया। पांच मूर्ती खाली सोने की थीं उन में एक का वज़न हमारे अब के ४ मन से ऊपर था। महावन को क़त्लआम किया। राजा अपने बाल बच्चों को मार कर आपभी मरगया । इसबार महमूद यहां से ५३०० आदमियों को ग्रजनी ले गया । ( सफ़ा ११ आईना तारीखनुमा सन् १८८९ ई० और मिफता हुत तवारीख हिस्सा अव्वल सफ़ा १० सन् १८८३ ई० )
दूसरी वर्ष महमूद ने पांचवीं बार इरादा जहाद का मुल्क हिन्द पर किया । इस के दिल में नगर कोट जिसे भीम कोट भी कहते हैं और ज्वाला मुखी अग्नि के चश्मा से कुछ दूर है लालच पैदा हुई। जितना माल उस में था ग्रारत किया और राजनी वे तादाद माल लेकर लौट गया। वहां जाकर उसने अपनी रियाया को बहुत सा माल देकर हिन्द से खबरदार किया (तवारीख हिन्दुस्तान सफ़ा ८० सन् १८८१ ई० )
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थानेश्वर का मन्दिर मुसलमानों के कब्जे में आया, उन्होंने उसे भारत किया और मूर्तियों को तोड़ा और एक मूर्ति जो उन में बड़ी थी उसे राजनी को भिजवा दिया ताकि उस पर मुसलमान क़दम रक्खें और उसे पामाल करें । दोलाख हिन्दू गुलामी में भेजे गये और उन गुलामों की बहुतायेत के सबब शहर ग्रजनी हिन्दुओं के शहर कैसा मालूम हुआ (देखो सफ़ा द८ तारीख हिन्दुस्तान सन् १८८९ ई० ) हिन्दू इस
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गई
क़दर कैद में आये कि उनकी कीमत दो दो रुपये हा ग (सफ़ा ८३ देखो तारीख हिन्दुस्तान )
मुहम्मद गोरी के जिक्र में लिखा है कि वह बनारस में गया और उस शहर को लूटा । और मन्दिरों को खाक में मिलाया ( सफा १०५ तवारीख हिन्दुस्तान )
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मुहम्मद गोरीने बहादुरीसे गखड़ों पर हमला किया और उन्हें ऐसा तक किया कि उन्होंने सिर्फ मातहती ही क़बूल नहीं की बल्कि मुसलमान होगये ( सफ़ा १०६ तारीख हिन्दुस्तान )
बख्तियार ने गोर में इवादत की जगहों में हिन्दुओं को मुसलमान बनाया और उनके पत्थर और लकड़ी वगैरह से मसजिदें, मदस और सरायें तय्यार कराई । ( सफ़ा ११३ तारीख हिन्दुस्तान )
अलाउद्दीन के हुक्म से एक मसजिद बजाय मन्दिर के बनाई गयी – शहर पटना जिसको सब इमारत सङ्गमर्मर की श्री खाक में मिलगया और बुद्धि की मूर्ति को गिरा दिया और पुस्तकें जो हिन्दुओं और बुद्धि के तरीकों के मुवाफिक थीं जला दिया ।
(नोट)- इस चढ़ाई में एक गुलाम खूबसूरत काफूर नाम और कोला देवी राजा की रानी जो स्वरूप में हिन्दुस्तान में उपमा न रखती थी- हाथ आयी । यह रानी बादशाही जनान खाने में दाखिल हुई और काफूर दरबारी नौकरों में मुकर्रर हुआ और ऐसे ही देवल देवी का लूट लाना और बादशाही ज़नान खाने में दाखिल होजाना (देखो सफा १२६ और १३४ तवारीख हिन्दुस्तान )
जयाउद्दीन वर्नी तारीख फीरोज़शाही और अबुलकासिम अपनी तारीख फिरिश्ते में लिखते हैं । “जिक्र अलाउद्दीन
የዩ
खिल्जी” बादशाह ने एक रोज काज़ी मुगैस से सवाल किया कि किस हिन्दू को किताब वालों और खिराज देनेवालों में समझना चाहिये । जवाब दिया कि जोसबसे जियादा खिद- मत करे और अपने मजहब की हिकारत होने पर भी हासिल करने वाले का हुक्म बजालाये और बिला उज्र खिराज अदा करे - अर्चि काफिरों का कत्ल करना हर हालत में जायज़ है लेकिन हमाम हलफी का मसला है कि क़त्ल के बजाय काफिरों से जिज़िया लिया जावै और जिजिये के वसूल करने में ऐसी तङ्ग तलवी हो कि उनको तकलीफ जहां तक हो सके कत्ल के क़रीब क़रीब पहुंचे - बादशाह ने फर्माया कि अगचि मैं तुम्हारी किताबों से अजान हूं तो भी अपनी बुद्धि बल से वहो काम करता हूं जिसकी आशा पैग़म्बर ने दी है । उसी बादशाह के सामने एक रोज़ काज़ी ने अर्ज
किया कि हे इस्लाम के मानने वाले तेरे राज्य में हिन्दू इस जिल्लत और मुसीबत को पहुंचे हैं कि उनकी औरतें और बच्चे मुसलमानों के दरवाजों पर भीख मागते फिरते हैं । इस उम्दह नतीजे की तारीफ़ तुमको मुवा- रिक हो और मैं जिम्मेदार होता हूं कि अगर इस नेक काम के बदले में तेरी ज़िन्दगी के तमाम गुनाह मुआफ़ न किये जावे तो क़यामत के दिन तू मेरा दामनगीर होना ( देखो बारीख बुलन्दशहर सन् १८७६ ई० सफ़ा १७ और देखो इतिहास तिमिर नाशिक सफ़ा ६१० जिल्द तीसरी पहिला अध्याय सन् १८७३ ६० और तारीख फिरिश्ता सफ़ा ११० मुकालेदोम) ।
जबरन इसलाम क़बूल करने का जोश जो मुहम्मद के बाद जारी होगया था - सिकन्दर लोधी के ज़माने में तरक्की पर आया। लेकिन उसकी जिन्दगी तक रहा। सफ़ा२ तारीख बुलंदशहर सन् १८७६ ई० ) ।
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- अहाद *
औरङ्गजेब की बादशाहत के निशानों में सबसे ज़ियादह जाहिर निशान इस ज़िले बल्कि सब हिन्दुस्तान में चन्द मौ मुस्लिम खान्दान बाकी हैं। इस बादशाह की मज़हबी तरफ़- दारी का एक छोटा सा नमूना बहहै कि आहार गांवके नागर मुसलमानों को पुरानी सनदों के तूमार से हमने एक परवाना देखा है जिसमें यहां के हाकिम को औरङ्गजेब ने लिखा कि चौधरी आहार जिला बुलंद शहर का खान्दान बहुत बढ़गया है और हर एक शस चौधरायत के पद का काम करना चाहता है। इससे प्रजा को दुःख होता है। आगे मुनासिब है कि कुल खान्दान से दो आदमी कांट लिये जावे और उनके सिवाय और किसी को चौधरायत के काम करने की इजाज़त न हो । और चूंकि हाल में दो शक्लों ने इस खान्दान से इस्लाम कबूल किया है इस वास्ते चुनाव में इनसे जियादद कोई नहीं है । यही दोनों आहारके चौथरो मुकर्रर किये जावें । ( तारीख बुलंदशहर सन् १८७६ ई० सफा २६ व २७ ) ।
औरङ्गजेब के ज़माने में कानूनगोंओंसे एक शक्स बुलंदशहर का मुसलमान हुआ उसकी औलाद ८० वर्ष तक इस गांव के बासियों में सर्दारी करती रही (तारीख बुलन्दशहर सफ़ा२३२)
टन्टा यानी डौर मुसलमान- यह लोग औलाद उसी जैपाल डोर के हैं। जिसने दया करके किले का दरवाज़ा खोल दिया और शहाबुद्दीन गौरी की फौज को किले में दखल देकर दिली नियामत राजा चन्द्रसैन को क़त्ल कराया। इस खिदमत के बदले में मुसलमान किया गया-सुल्तान गौरी ने जैपाल को खिताब “मुहम्मद दराज़ कद” का बख़्शा और परगना वरन का चौधरी मुकर्रर किया गया (तारीख बुलंदशहर सफ़ा २३२ व २३३ । )
- जहाद
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मुफस्सिल फिहरिस्त उन मन्दिरों को ( अगर कोई देखना चाहे ) जो मुसलमानों ने जबरन गिराकर मसजिदे बनाई या तबाह किये या तोड़ दिये तो (देखो रिसाला मखज़बुल उलूम बरेली माह मार्च सन् १८७१ ई० जिल्द तीसरी नं० ७ सफा ४४ माह नवम्बर नं० ११ सफ़ा १३ ) ।
सिकना भेड़ को तैमूर ने कत्ल करा दिया और शहर को मय रईसों के जला दिया । सरस्वती पर हमला किया और शहर को फूंका और वहां के वाशिन्दों को क़त्ल किया- मुसलमानों के इतिहास लेखक कहते हैं कि हमने इस बात की खोज के बाद कि अक्सर कैदी काफ़िर हैं एक लाख उनमें से मरवा डाले। इसे आदम के क़त्ल से बड़ी खुशी हासिल होती थी और बाज़े वक्त बड़ी खूनखराबी करने के बाद दूसरे क़त्ल किये हुओं को बतौर मिनारे के चुन देता और इस राह रास्तसे अपने तई बचाता । तवारीख हिन्दुस्तान मतबूआ सन् १८५३ ई० सफा
१२० १ १५१ और मिफताहुत तवारीख
हिस्सा अञ्चल सफा २९ ) ।
अकबर का हिन्दू राजपूतों से जबरन वेटियां लेना भी एक इस्लामी ज़ल्म का निशान है ( सीरतुल मुताखरीन सफ़ा ३७ ) ।
औरङ्गज़ेब के ज़माने में अहार के नागर ब्राह्मणों से दोने इस्लाम क़बूल किया और इस ज़रिये से सब भाई बन्धों को परगने की चौधरायत के मौरूसी अहद से खारिज करके खुद चौधरी बने । सब हिन्दू नागरों की जमीन्दारी सिर्फ दो गांव और मुसलमान नागरों की तीन गांव में है । सन् १८५७ ई० के प्रदर में मुसलमान नागरों में से बाजने बगावत अख्तियार की और इस जुर्म की सजा में उनकी जागीरें ५८
और मिलकियत सर्कार ने जब्त करके राजा गुरुसहाय मल रईस मुरादाबाद का इनाम दीं (देखो तारीख बुलंदशहर सफ़ा २०२ । )
ता ब्राह्मण - सबसे जियादा इस जाति का खान्दान सियाना के गांव में है लेकिन आधे से ज़ियाहा आदमी इस खान्दान के औरङ्गजेब के ज़माने से मुसलमान हैं ( तारीख बुलंदशहर सफ़ा ३०४ । )
लालखां बड़गूजर ठाकुर - अशरफ़नामें में अशरफखां लालखानी ने लिखा है । प्रतापसिंह की नवीं पीढ़ी में लाल खां हुआ । अगर्चि यह नाम मुसलमानी मालूम होता है लेकिन लालखां हकीक़त में मुसलमान न था - अस्ली नाम लालसिंह था-अकबर बादशाह ने खिताब सानो बख्शा तब उसने अपना नाम बजाय सिंह के खान का पद शामिल कर लिया - लालखां के लड़के सालवाहन ने शाहजहां बादशाह से ६४ की जमीन्दारी हासिल की और उसका नाती एतमाद राय औरङ्गज़ेब के जमाने में मुसल्मान हुआ” । ( तारीख जिला बुलंदशहर सफा ११३ व ११४ । )
बाज वाज लालखानियों के सिवाय सब बढ़गूजर हिन्दुओं की रस्मों को मानते हैं अपने गोत में शादी नहीं करते - गो हत्या से परहेज करते और अपने लड़कों के दो दो नाम एक हिन्दू नाम दूसरा मुसलमानी रखते हैं। शादीके दिनों में दरवाजों पर उस कुमारी औरत की तसबीर बनाकर पूजते हैं जिसकी कृपा से अपने पूर्वजों की तरक्की होना समझते हैं" । ( तारीख बुलंदशहर सफ़ा ३१५, ३१६ । )
“यहां राजपूतों में से कीरतसिंह की सातवीं पुस्त में खुमानचन्द सम्भल के हाकिम दरियाखां के प्रसन्न करने के
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लिये खनरखां बादशाह के ज़माने में मुसलमान हुआ और इस हिकमत से उसने अपनी मौसी इलाके में आधा हिस्सा पाया। हालांकि उसका भाई कुल इलाके का दावेदार था. मुसलमान होने के बाद खुमानचन्द का नाम मलिखान रखा गया परगना चौधरायत का उहदा पाया । उनके वारिस चाहे हिन्दू हो वा मुसलमान हों चौधरी कहलाते हैं” ( तारीख बुलंदशहर सफा ३१७ ) ।
हिसार के ज़िले में भटे या जैसवारजादों जियादहतर मुसलमान और बहुत कम हिन्दू हैं ( तारीख बुलन्दशहर सफ़ा ३२४ | )
तनूर या तोमर राजपूत — राजा बहपाल ने जो अनंगपाल की दशवीं पुस्त में था यह मौजा वहसाना आबाद किया- चुनांचि वहपाल की संतान से ४५ गांव अब तक आबाद हैं उसी की नसल से बुलंदशहर के तनूर हैं लेकिन अक्सर उन
मुसलमान होगये हैं । मुसलमान तनूरियों का कहना है कि हमारे पूर्वज नागलसिंह को कुतुबुद्दीन ऐवक ने किसी जुर्म में कान काटने की सज़ा के बाद जबरन मुसलमान किया था।
चुनांचि नागलसिंह का बसाया हुआ मौज़ा पूजा नागिल बुलंद शहर से चार मील पर अब तक आवाद है । थोड़ा अर्सा हुआ कि मौज़ा मज़कूर में तन्नूर मुसलमान रहते थे अब इन तन्नूरियों की रिश्तेदारी झूझों के साथ होने लगी चूं कि झूझों की कौम नीची गिनी जाती है इसलिये ये तन्नूर भी राजपूतों की फिहरिस्त से खारिज हैं । ( तारीख बुलन्द शहर सफा ३२६ ) |
चौहान - राजपूत कालू को सिकन्दराबाद के हाकिम ने लुटवाया - इस ज़ुल्म के सबब कालू के नाथ पिथराजने हाकिम
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को कत्ल किया और सजा से बचने के वास्ते बादशाह के पास जाकर मुसलमान हुआ। बादशाह ने सिर्फ पिथराज का दोष ही क्षमा नहीं किया बल्कि उसको मित्र बनाया और पद आरिकराय का दिया और तगो के ३२ गांव की ज़मीन्दारी दी । ( तारीख बुलन्द शहर सफा ३२७ व ३२८ ) ।
बरगला राजपूत—औरङ्गजेब के जमाने से बहुत से बरगले मुसलमान हैं ।
नौ मुसलिमों में नीच कौम के लोग मसलन- जुलाहे - कसाई रंगरेज, धोबी, लुहार, धुनें वगैरह अपने तई अक्सर शेख कहते हैं । ( तारीख बुलन्द शहर सफ़ा ३७४ ) ।
एक और योग्य इतिहास लेखक फर्माते हैं । मंगोलियन जाति का पूर्वज मंगल नाम क्षत्री था । और वह बीर राजा एक समय चीनी तातार की तरफ़ सैर को गया था और वहां ही जाकर बस गया। यह बात महाभारत के युद्ध से पहिले की है । इसीके नाम से मंगोलिया देश का नाम पड़ा। (देखो तारीख बदवअ हिन्दोस्तान ) ।
कौम जुलाहे नौ मुसलिमों में दाखिल हैं जुलाहे कपड़े बिनने के सिवाय और पेशा कम करते हैं। लफ्ज जुलाहा हकीर समझा जाता
है ।
जाट मुसलमान को पौला और तगा मुसलमान को मौला कहते हैं । भटियारे भी नौ मुस्लिम हैं जिनको शेरशाह बाद - शाह ने मुसलमान किया वे शेरशाही और जिनको सलेमशाह के ज़माने में मुसलमान किया गया वे सलेमशाही कहलाते हैं । भेद इतना है कि शेरशाहियों की औरत लहंगा पहनती हैं और सलेमशाही की औरतं पाजामा पहिनती हैं- इन दोनों के अलावह चिड़ीमार और खत्री दो गोत्र और भटियारों के हैं
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भटियारों में शादी के वक्त हिन्दुओं की बाज़ रसूमें अबतक मानी जाती हैं।
नोट- हमारे ख्याल में भटियारे हिन्दू कहारों से हुए हैं । किसी वक्त बादशाही डोला उठाने के वास्ते हिन्दू कहार पकड़े जाते होंगे जिस डर से सरोब मुसलमान होगये ।
हाय अफसोस इन मुसलमानों ने इस देशको उसी हालत में दबा रखा - जिसमें ईरान, तूरान, शाम अफगानिस्तान है। यह हज़रत मुसलमान जहां गये यही हाल हुआ । इनके राज्य में कोई देश उन्नति पर नहीं चढ़ा ।
பழ
सिकन्दर लोधी के ज़माने में एक दफे का जिक्र है कि एक ब्राह्मण ने अर्ज किया कि हिन्दू और मुसलमान दोनों का दीन सच्चा है । बादशाह ने सुन्कर उसको क़त्ल करवा डाला । “हिन्दुओं की तीर्थ यात्रा अपने देश में बन्द करदी - जो शहर किला फतह होता वहां के मन्दिर और मूर्ते तोड़ डालता- मथुरा में हिन्दुओं की हजामत करनी छुड़वा दी थी” (देखो सफ़ा अव्वल आईने तारीख नुमा सफ़ा ७० सन् १८७४ ई० ।
इन लोगों ने अपनी किताब में लिखी हुई बात के सिवाय किसी नई बात की खोज करना बहुत ही बुरा और लोंडी गुलाम बनाना ही सारी दुनिया की आरायश मानली ( सफ्रा ५४, ५५ इतिहास तिमिर नाशिक सन् १८७४ ई० ) ।
खुद तैमूर ने अपने हिन्दुस्तान में आने के दो मक़सद लिखे हैं । इस्लाम के दुश्मन काफिरों से लड़ना और इस दीन की लड़ाई से आक्रबत (परलोक ) की वशिश के उम्मेदवार- मक़सद दुनियाका यानी मुसलमानों की फौज काफिरोंका माल लूटे और फायदा उठावे - मुसलमानों को लूट का माल ऐसा हलाल है जैसा मां का दूध । ( सफ़ा ५८ तिमिर नाशक
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तृतीय भाग और मल फूज़ात तैमूरी) और जुल्म ( इतिहास तिमिर नाशक तृतीय भाग
अव्वल अध्याय सन् १८७३ ई० )
देखो तैमूर के सफ़ा ५६, ६८,
मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्धु फतह करने पर ३० हज़ार आदमी क़ैद किये उस में से छः हज़ार बगदाद के खलीफ़ा वलैद के पास भेजे - खलीफ़ा ने कुछ को बेचा, कुछ को इनाम में भेट दिया, राजा की भान्जी बेचारी को अपने भतीजे के हवाले किया और मुहम्मद बिन कासिम को लिखा कि काफिरों को अमन हरगिज़ न देना चाहिये सब को मार डालना चाहिये सिर्फ उन को जीता रख जो बड़े दर्जे के हों यही खुदा का हुक्म है । " मन्दिरों में मूर्ते तोड़ी गई- तमाम हिन्दू कत्ल किये गये - बहू बेटी बच्चे लोंड़ो गुलाम बनाये गये ।
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मुहम्मद बिन कासिम ने जब चढ़ाई की ६००० हिन्दू मारे गये ३०००० कैद हुए इस में राजा दादर की दो लड़किया भी कैद होकर आई - जब वे खलीज़ा के सामने गई तो उन्होंने कहा हम तुम्हारे लायक नहीं । कासिम ने हमें पहिले ही खराब कर दिया था । इस पर खलीफ़ी ने कासिम को मरवा डाला । जब मुहम्मद बिन कासिम की लाश लड़कियों को दिखाई तो लड़कियां हंसी और बोलीं हम ने इस बहाने से अपने बाप का बदला लिया। खलीफ़ा ने इन को घोड़े की दुम से बंधवा कर घसीटने का हुक्म दिया। फिर उन की लाशों को दजला नदीं में फिकवा दिया- धन्य देवियों धन्य इतिहास तिमिर नाशक सफ़ा ५७ तीसरा भाग सन् १८७३ ई० अव्वल अध्याय )
" सब से अधिक दुःख दाई जिज़िये का महसूल है खलीफा उमर के कायदा बमूजिब गैर मुस्लिमों हिन्दुओं से
- जहाद *#
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सामर्थ वालों से ४८ मध्य श्रेणी के आदमियों से २४ और गरीब मज़दूरों से १२ दिरहम लेने का हुक्म था - लेकिन १०० वर्ष के अन्दर दूसरे उमर ने यह हुक्म निकाला कि जो साल भर में पैदा कर सका है अपनी गुज़र के मुआफिक रखकर बाकी सब सर्कार को दे- अजब तमाशा है हिन्दुओं का नाश करना और उन की मूर्ते तोड़ना तो मुसलमान बड़ा धम समझते हैं " ( सफ़ा ५८ इतिहास
( सफ़ा ५८ इतिहास तिमिर नाशक भाग ३ सन् १८७३ )
एक ईमानदार इतिहास लेखक लिखता " मेरे वक्त में जब बख्तियार खिल्जी ने बिहार फतह किया वहां सर मुन्डे ब्राह्मण बहुत पाये सब को कटवा डाला ।"
जलालुद्दीन खिल्जीने भेलसा
से हिन्दुओं की बहुत पुरानी पीतल की मूर्तियां मंगवा कर किले के दरवाजे पर मुसलमानों के पैरों से रुंदवाया और दो दफ़ा मालवा लूटा | (देखो तिमिर नाशक सफ़ा ६० तीसरा भाग )
मौलवी अब्दुल्ला बसाफ़ अपनी तारीख में लिखते हैं कि अलाउद्दीन खिल्जी ने खम्बात की तरफ़ फौज भेजी, बायें दायें होकर सख्त दिल से इस्लाम के लिये सब को कत्ल करने लगे (देखो तज़करह उल इमसार )
इस लूट में बहुत सा माल अलाउद्दीन की फौज को हाथ लगा । बीस हज़ार सुन्दर स्त्रियां जो कैद में आई थी लौडी वनाई गई। और लड़की लड़के भी इतने लिये कि क़लम लिख नहीं सक्ती । इस बादशाह को काटने और जलाने में ज़रा भी तअम्मुल न था । (देखो तज़करा उल इमसार )
फीरोज़शाह बादशाह की बाबत लिखा है “कांगड़ा की फतह के वक्त मूर्ती को तोड़कर उनके टुकड़ों को गो मांस के
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साथ तोवड़ों में भरकर ब्राह्मण पुजारियों के गलों में लटका दिया और तमाम बाज़ार में किराया " ( तारीख फिरिश्ता व तिमिर नाशक सफ़ा ६४ तृतीय भाग )"
एक दिन उसे खबर पहुंची कि देहली में एक बूढ़ा ब्राह्मण मूर्ति पूजा करता है और त्योहार पर और भी हिन्दुओं को पूजाके लिये घर बुलाता है । उसे फोरोज़शाह ने मूर्ति समेत पकड़वा मंगाया । मौलवियों ने फतवा दिया कि मुसलमान होजावे नहीं जलाया जावे। उसके इन्कार करने पर किले के दरवाज़े के सामने चिता बनवाकर उसके हाथ पैर बन्धवाकर मूर्ति समेत सब दरबार के सामने जलवा दिया और यह फीरोज़शाह ने अपनी फतुहात में लिखा है ।
“गयासुद्दीन तुगलक ने अपने भाई रजब की शादी के लिये सुना कि रानामल भटी की बेटी बहुत सुन्दर है । फौज लेकर चढ़ा और जवरन उससे लड़की छीन ली वर्ना उसके सब रिश्तेदारों को कत्ल कर देता” ( देखो तिमिर नाशक सफ़ा ६६ तीसरा भाग )
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जब फीरोज़ शाह ने जैसलमेर पर हमला किया तो उस वक्त उन के जुल्मों से तंग आकर १६००० स्त्रियां सती हो गई और एक दफे १२६५ ई० में इन्हीं जुल्मों से तंग आकर २४००० हजार औरतों ने आग और तलवार से खुद कशी की थी। । टाट साहबने राज स्थान में बिदित करके लिखा है (देखो तिमिर नाशक भाग तीसरा सफ़ा ७६ )
तैमूर ने जब जम्बू के राजा को गिरफ्तार किया उसीदम उसे मुसलमान करके गो मांस खिला दिया । ( देखो तिमिर नाशक सफ़ा ६१ तृतीय भाग अव्वल अध्याय सन् १८७३ ई० )
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तुज़क बावरी में लिखा है- “ लड़ाई में जो हिन्दू कैदी हाथ लगते थे उस के डेरे के सामने क़त्ल किये जाते थे । एक लड़ाई के बाद इतने कत्ल किये गये कि खून और लाशों के मारे तीन बार जगह बदलनी पड़ी ।"
एक जोगी जटा बढ़ाये परम हंसकी तरह देहली में फिरता था । औरंगजेब ने हुक्म दिया कि मुसलमान हो जाओ उस ने इन्कार किया फौरन उस का सिर काटा गया ( निमिर नाशक तीसरा भाग सफ़ा ७७ )
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तारीख फिरिश्ते में लिखा है कि गुलवर्गा के बादशाह महमूद
ने तैलंग देश के राजा की लड़की की ज़बान कटवाकर उसे जीता आग में भुनवा डाला और पांच लाख हिन्दुओं का गला काटा। अहमद जहां जिस दिन २०००० के ऊपर हिन्दू मारे जाते खुशियां मनाता और गाने बजाने नाचने का तमाशा देखता (देखो तिमिर नाशक सफ़ा ७७ तीसरा भाग सन् १८७३ ई०
" औरंगजेब ने राजा शिवाजी के पुत्र सम्भाजी से कहा तू मुसलमान होजा । उसने इन्कार किया और ऐसा जवाब दिया कि औरंगजेब ने गरम लोहे से उस की आंखें निकलवा कर और ज़बान कटवा कर मरवा डाला " ( देखो फतूहुल तवा- रीख हिस्सा अव्वल सन् १८७३ ई० ।
औबङ्गजेन ने हिन्दुओं को तमाम बड़े बड़े ओहदों से निकाल दिया और उनके मन्दिरों को ढा दिया और उनकी मज़हबी रमतों में मजाहिम हुआ" ( सफा ६७ मुफताडल तवारीख हिस्सा अव्वल सन् १८८३ ई० । )
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“औरङ्गजेब ने अपने सरदारों को गश्ती खत भेजा था कि कोई हिन्दू नौकर न रक्खा जावे। तमाम ओहदे मुसल- मानों को दो” ।
बनारस में विश्वनाथ और बेनीमाधो और मथुरा में गोविन्ददेव के मशहूर मन्दिरों को उसने तोड़ा । ( मुफताडल तवारीख सफ़ा ६६ सन् १८८३ ई० हिस्सा अव्वल । )
खुदा की खलकत के साथ जो जो सलूक बानी इसलाम और उसके पैरों ने किये हैं वह हमने नमूने के तौर पर मुस्तनद तारीखों के हवालों कौर लायक इतिहास लेखकों की शहादत से साबित कर दिवे ।
इन तमाम के लिखने से हमारा प्रयोजन है कि आप लोग खुदा को हाजिर नाज़िर जानकर और इतिहासों को पढ़कर उनमें बेगुनाह अल्लाह की सृष्टि के हक में इस्लामी खूरेज़ी को पढ़कर दिल में सोचें कि जिस दोन ने लाखों को लोंडी गुलाम बनाया-करोड़ों को खाना खराब किया अगणित मनुष्यों का घोर अपमान किया और जितने क़त्ल किये उनकी गणना तो ईश्वर के सिवाय कोई नहीं बतला सका। क्या ऐसा दीन कुल दुनियां के मालिक जगदीश्वर व रज्बुल अलिमीन की तरफ से हो सक्ता है ? और क्या इस कदर तवाहियां और खाना खराबियां खुदा के खुशनूद करने व दीन हक्क फैलाने या खुदा की मर्जी के मुताबिक वाकै हुई । “हरगिज़ नहीं ? हरगिज़ नहीं !! प्यारे मित्रो, शिक्षित पुरुषो दरहकी- कत सोचने का मुकाम है । क्योंकर सच्चे धर्म और दीन हक को इस तरहकी बातों और ऐसी हरकतों से अत्यन्तही घृणान हो । सच्चे दयालु और आदिल परमेश्वर का वह धर्म है जिसमें सबके साथ इन्साफ़ का बर्ताव हो - जबर और क़हर का
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लगाव न हो । तअस्सुब और वेजा तरफ़दारी से काम करना आदिल हक़ीकी पर इलजाम है और जिस मज़हब में ऐसी वातों से परहेज़ नहीं वह दर हक़ीक़त बदनाम है । और उसी के मानने वालों का खैरियत से अंजाम पाना निहायत ही मुश्किल है । अतएव मनुष्य मात्र को ऐसी पाशविक हरकतों को धार्मिक समझना बड़ी भूल है। जहां पशु अपनी जाति के पशुको दुखी देखकर और पक्षी अपनी जाति के पक्षी को दुखी देखकर सम्वेदना कर उसके सहाय होते हैं । हम इन मनुष्यों को कौन पद देवें जो निरपराध अपने मनुष्यों की सहायता देना एक तरफ़ रहा निरपराध क़त्ल करते, जीवित जलाने, व दीवालों में जीवित चिनवा देते हैं। संसार में कोई भी सभ्य पुरुष इसको धर्म कह सका है । आशा है कि हमारे मुहम्मदी भाई उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे ताकि इन अमानुषी कृत्यों और पापों की धारणा उनके हृदय में न रहे तथा हिन्दू लोग आत्मरक्षण के लिये सदैव इस्लामी अत्यचारों से सचेत रहें ताकि उनकी अकाल मृत्यु न हो यही हमारी प्रार्थना है ।
सम्पूर्णम् ॥
Postscript
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हिन्दू उत्थान की सामिग्री । हिन्दू सङ्गठन विधि |
+3:0:-
TANTI.
इसमें हिन्दू अस्तित्व,जाति वाद का प्रभाव, धार्मिक दृढ़ता, हिन्दुओं के हकों के पामाली के लिये सर सैय्यद अहमद की युक्तियां, हिन्दू सङ्गठन, हिन्दुओं की नामर्दमी और कायरता आत्मबलिदान, हिन्दुओ अपने बल पर खड़े हो, पुराणों और वैष्णव धर्म में मुसलमानों की शुद्धि, मुसलमानों का निर्दोष हिन्दुओं पर घोर अत्याचार, जातीय जोश, मुहम्मद साहब पैराम्बर या धर्म प्रचारक नहीं किन्तु मनुष्य जाति के भयानक थे । वर्तमान हिन्दू भाव हिन्दू सङ्गठन का एक मात्र साधन व हिन्दू मिशन का कार्य आदि विषयों का पूर्ण वर्णन है वास्तव में मुर्दा हिन्दू जाति को जोश दिलाकर अपने बल पर खड़ी करनेवाली और विधर्मियों के अत्यचारों से बचाने वाली ऐसी पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई मूल्य १) ।
शत्रु .
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हिन्दू देवियों का आत्म वलिदान ।
:०:
हिन्दू देवियों ने अपने विनिश्वर शरीर को जिस वीरता से आत्म वलि देकर मुसलमान अत्याचारियों से धर्म की रक्षा की उसका हृदय विदारक दृश्य अत्यन्त ओजस्विनी कविता में दिखाया गया है मूल्य ।)
कुरान आदर्श
ξε
NTI.
यह क़ुरान और मुसलमानी धर्म की कसौटी है । इस में अरब, अर्बी भाषा, अबीं अक्षरों की उत्पत्ति, अरबियो की मूर्ति पूजा और नक्षत्र पूजा मुहम्मद का जीवन चरित्र, क़रान मैं मसाला किन २ मज़हवो से लिया गया है । क़ुरान में एक के बिरुद्ध अनेक वाक्य, कुरान में इतिहासिक व भूगोलिक बृहत्भ्रातिया, दीन, ईमान फिरिश्तों, जिन्नों पैग़म्बरों, कयामत, नरक, स्वर्ग रोज़ों, नमाज़ शिया सुन्नियों के भेद, मुसलमान ब शहीद शब्द की व्याख्या आदि विषयों का पूर्ण उल्लेख है । ऐसी युक्त पूर्ण पुस्तक का मूल्य १) रु०
विर्घामयों को हिन्दू बनाने की युक्तियां
DEL
:-
हिन्दू वृद्धि के लिये ईसाई व मुसलमानों को हिन्दू छत्र के अन्तर्गत लाना और हज्मकर जाना होगा। तभी हिन्दू जाति दिग दिगन्त व्यायिनी हो सकेगी। इस में ऐसे उपायों का समावेश है कि सभी सम्प्रदाय सहर्ष इस प्रयत्न में तन्मय हो जावें । मूल्य प्रथम भाग ) द्वितीय भाग ।)
घर बैठे इलाज ।
ANTI.
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प्रत्येक पुरुष को कुछ ऐसे रोगों का जिनका आक्रमण प्रायः हुआ करता है ऐसे रोगों को सामान्य ज्ञान और उनके चिकित्सा की सुगम और उपलब्ध क्रिया के जानने से धन व जन की रक्षा प्रत्येक समय हो सकती है । अतएव पाठकों के श्रय के लिये ऐसी ही पुस्तकें प्रकाशित की गई हैं। पाठकगण इनके खरीदने में जितना रुपया व्वय करेंगे उससे हजारों गुना द्रव्य डाक्टर वैद्य हकीमों के हाथ से बचाकर अपने स्वजनों की प्राण रक्षा प्रत्येक समय कर सकेंगे ।
ज्वर चिकित्सा
इस में ज्वर से बचने के प्राकृतिक उपाय व अनेक ऐसी अक्सीर औषधियों का विधान है कि ज्वर तुरंत काफूर हो जाता है । मूल्य 12)
कांस स्वांस चिकित्मा
खांसी और दम का निहायत कामिल इलाज है मूल्य ।) क्षयरोग चिकित्सा
इसमें क्षपरोग का प्राकृतिक चिकित्सा व उस से मुक्त होने के अनेक परीक्षित सफल उपायों का पूर्ण विधान है मूल्य II)
पता - पं० रघुनाथ प्रसाद मिश्र छिपैटी इटावा ।